नयी दिल्ली, दो सितंबर (भाषा) सरकार ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही की आर्थिक वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत के बजाय करीब 2.6 प्रतिशत रहने के दावे को खारिज करते हुए बुधवार को कहा कि नवीनतम जीडीपी अनुमान की तुलना पुरानी और बदली जा चुकी श्रृंखला से करना ‘सेब और संतरे’ की तुलना करने जैसा है।
इसके साथ ही, सरकार ने कहा कि अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्थव्यवस्था के ठोस उत्पादन आंकड़ों पर आधारित है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने यह स्पष्टीकरण पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की टिप्पणी के बाद दिया है। पूर्व वित्त सचिव का दावा है कि अगर पिछले साल की जून तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद को करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये नहीं किया जाता तो मौजूदा कीमतों पर पहली तिमाही की वृद्धि करीब 2.6 प्रतिशत ही रहती।
सांख्यिकी सचिव ने कहा कि यह तर्क इसलिए सही नहीं है क्योंकि इसमें स्थिर कीमतों के बजाय मौजूदा कीमतों के आंकड़ों की तुलना की गई है। इससे भी महत्वपूर्ण है कि 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी जीडीपी श्रृंखला से संबंधित था, जबकि नवीनतम अनुमान 2022-23 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला के तहत तैयार किए गया है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में इस्पात, सीमेंट और वाहन जैसे क्षेत्रों के उत्पादन में मजबूत वृद्धि दर्ज हुई है। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे में पुरानी और नई जीडीपी श्रृंखलाओं के आंकड़ों को आपस में मिलाकर वृद्धि दर पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है।’’
सांख्यिकी सचिव ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल-जून तिमाही में 86.05 लाख करोड़ रुपये जीडीपी का अनुमान 2011-12 आधार वाली पुरानी श्रृंखला के तहत अगस्त, 2025 में जारी किया गया था। लेकिन फरवरी, 2026 में 2022-23 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला लागू होने पर इस तिमाही का मौजूदा कीमतों पर जीडीपी अनुमान 80.32 लाख करोड़ रुपये हो गया।
अस्थायी जीडीपी अनुमान जारी होने पर यह आंकड़ा संशोधित कर 80.44 लाख करोड़ रुपये किया गया। बाद में नई औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) तथा उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) श्रृंखला समेत अद्यतन आंकड़ों को शामिल करने पर इसे 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि आंकड़ों में लगातार किए गए बदलाव सामान्य संशोधन प्रक्रिया और अतिरिक्त सूचनाओं को शामिल किए जाने को दर्शाते हैं, वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए पिछले साल की जीडीपी को कम करने के किसी प्रयास को नहीं।
उन्होंने कहा, “आंकड़ों को अब कम किए जाने का दावा उस आंकड़े को लेकर है, जो फरवरी, 2026 में जारी किया गया था, लेकिन उसका हवाला नहीं दिया गया है।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक वृद्धि की तुलना एक ही तुलनीय जीडीपी श्रृंखला के अनुमानों और स्थिर कीमतों पर की जाती है, जिससे कीमतों में अंतर के प्रभाव को हटा दिया जाता है।
मंत्रालय ने इस संदर्भ में जारी बयान में कहा कि ये बदलाव नए आधार वर्ष, बेहतर आंकड़ा स्रोतों, अद्यतन पद्धतियों और अतिरिक्त जानकारी को शामिल करने की सामान्य संशोधन प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य नवीनतम वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाना नहीं है।
मंत्रालय ने विनिर्माण क्षेत्र में नकारात्मक अंतर्निहित मूल्य ‘डिफ्लेटर’ (मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाने वाला), खनन में बाजार मूल्य एवं वास्तविक वृद्धि के बीच बड़े फासले और उत्पादन एवं व्यय-आधारित अनुमानों के बीच सांख्यिकीय अंतर से जुड़े सवालों के जवाब दिए हैं।
संशोधित जीडीपी श्रृंखला के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी।
मंत्रालय ने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र के लिए नकारात्मक अंतर्निहित सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) डिफ्लेटर का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि कारखाने से निकलने वाले उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई है।
जून तिमाही में विनिर्माण जीवीए की गणना ‘डबल-डिफ्लेशन’ पद्धति से की गई। इसमें उत्पादन और मध्यवर्ती खपत को कीमतों में बदलाव के आधार पर अलग-अलग समायोजित करने के बाद वास्तविक जीवीए निकाला जाता है। जब कच्चे माल की कीमतें उत्पादन कीमतों से अधिक तेजी से बढ़ती हैं, तो नाममात्र जीवीए की वृद्धि वास्तविक जीवीए की तुलना में कम हो सकती है। इससे दोनों उत्पादन और कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद नकारात्मक निहित जीवीए डिफ्लेटर बन सकता है।
मंत्रालय ने कहा कि पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का वास्तविक जीवीए 9.2 प्रतिशत बढ़ा, जबकि मौजूदा कीमतों पर वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही। इस तरह निहित जीवीए डिफ्लेटर नकारात्मक 1.5 प्रतिशत रहा।
कपड़ा एवं कपास ओटाई, बुनियादी धातु तथा रबड़ और प्लास्टिक उत्पाद ऐसे क्षेत्र हैं जहां कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि उत्पादन कीमतों से अधिक रही।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 2.5 प्रतिशत की निहित जीडीपी मुद्रास्फीति दर उपभोक्ता और थोक मुद्रास्फीति से बहुत भिन्न क्यों हो सकती है।
जीडीपी डिफ्लेटर पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतों में बदलाव को मापता है और यह मौजूदा कीमतों पर जीडीपी एवं वास्तविक जीडीपी के अनुपात से निकाला जाता है। इसके उलट, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) घरेलू खपत के एक निर्धारित समूह की कीमतों को मापता है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) मुख्य रूप से वस्तुओं पर केंद्रित होता है और सेवाओं को शामिल नहीं करता। जीडीपी डिफ्लेटर निवेश, सरकारी खर्च, निर्यात और सेवाओं की व्यापक श्रेणी समेत पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतों के प्रभाव को दर्शाता है।
मंत्रालय ने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद का आंकड़ा तैयार करने में वस्तुओं या समूह के स्तर पर 300 से अधिक अलग-अलग मूल्य डिफ्लेटर का इस्तेमाल होता है। इसलिए निहित जीडीपी डिफ्लेटर का सीपीआई या डब्ल्यूपीआई के अनुरूप ही चलना जरूरी नहीं है।
खनन क्षेत्र में वास्तविक और मौजूदा कीमतों पर जीवीए वृद्धि के बीच बड़े अंतर पर मंत्रालय ने कहा कि इसका मुख्य कारण खनिज कीमतों में तेज वृद्धि है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में खनन एवं संबद्ध क्षेत्र का वास्तविक जीवीए 2.4 प्रतिशत घटा। वहीं, खनन एवं संबद्ध क्षेत्र का मौजूदा कीमतों पर जीवीए 22.3 प्रतिशत बढ़ा है।
मंत्रालय के अनुसार, इस दौरान खनन एवं संबद्ध क्षेत्र की पीपीआई मुद्रास्फीति अप्रैल में 22 प्रतिशत, मई में 21.2 प्रतिशत और जून में 15.5 प्रतिशत रही। कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में मई में 72.2 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई, जबकि धातु एवं अयस्क की कीमतें तीनों महीनों में 23 प्रतिशत से अधिक बढ़ीं।
मंत्रालय ने उत्पादन और व्यय पद्धतियों से निकाले गए जीडीपी अनुमानों के बीच सांख्यिकीय विसंगति को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा। उसने कहा कि यह दोनों पद्धतियों से प्राप्त अनुमानों के बीच अंतर को दर्शाने वाला एक संतुलन मद है और अधिक व्यापक आंकड़े उपलब्ध होने पर इसमें बदलाव हो सकता है। इसके आकार को अपने-आप में जीडीपी के कम या अधिक आकलन का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
मंत्रालय ने कहा कि भविष्य में संशोधनों के दौरान जीडीपी किसी भी दिशा में बदल सकती है। हालांकि, मौजूदा कीमतों के अंतिम अनुमानों में यह अंतर बहुत कम या शून्य हो जाता है। वित्त वर्ष 2022-23 और 2023-24 इसके उदाहरण हैं।
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