जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड में लैवेंडर की खेती को बढ़ावा देने की पहल

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जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड में लैवेंडर की खेती को बढ़ावा देने की पहल

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  • Publish Date - February 21, 2026 / 09:10 PM IST,
    Updated On - February 21, 2026 / 09:10 PM IST

भद्रवाह (जम्मू-कश्मीर), 21 फरवरी (भाषा) लैवेंडर की खेती को और मज़बूती देने के लिए जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में 750 किसानों के बीच लगभग छह लाख मुफ़्त गुणवत्तापूर्ण रोपाई सामग्री (क्यूपीएम) के पौधे बांटे गए हैं। एक अधिकारी ने शनिवार को यह जानकारी दी।

सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू के लैवेंडर वैज्ञानिक संदीप सिंह चरक ने कहा कि इस पहल का मकसद इस अनोखी खुशबूदार फसल की खेती को बढ़ाना, किसानों की आय बढ़ाना और देश में लैवेंडर उत्पादन के केन्द्र के बतौर इस इलाके की बढ़ती पहचान को और मज़बूत करना है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में भद्रवाह की 50 नर्सरी में मुफ़्त पौधे बांटे गए, जिसे भारत की बैंगनी क्रांति की जन्मभूमि के तौर पर जाना जाता है।

चरक ने कहा, ‘‘आईआईआईएम जम्मू ने उत्तराखंड के 400 किसानों और जम्मू-कश्मीर के डोडा, राजौरी और पुंछ जिलों के 350 किसानों के बीच छह लाख लैवेंडर के पौधे खरीदे और बांटे हैं।’’

उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया जारी है और इस मौसम में अन्य किसानों को भी पौधे दिए जाएंगे।

एक प्रगतिशील किसान और युवा उद्यमी तौकीर बागबान ने कहा कि पौधे बांटने का यह कदम लैवेंडर किसानों के लिए एक बड़ा बढ़ावा है।

‘लैवेंडर मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर बागबान ने कहा, ‘‘सीएसआईआर-आईआईआईएम ने न केवल नर्सरी मालिकों से छह लाख पौधे खरीदे, बल्कि उन नए किसानों को भी मुफ्त पौधे बांटे जो पारंपरिक फसल से विशिष्ट लैवेंडर की खेती करना चाहते हैं।’’

उन्होंने इस सफलता का श्रेय केंद्रीय मंत्री जितेंदर सिंह की निजी कोशिशों को दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘लैवेंडर की तरफ़ जाने से किसानों की आय में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है, और कमाई लगभग 40,000-60,000 रुपये प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 3,50,000 – 6,00,000 रुपये प्रति हेक्टेयर से अधिक हो गई है।’’

चरक ने कहा कि लैवेंडर एक कम देखभाल वाली, सूखा-रोधी और जानवरों से बचाने वाली फ़सल है, जो इसे पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त है। यह पौधे लगाने के पहले दो साल के बाद लगभग 15 साल तक फ़ायदा देती है।

भाषा राजेश राजेश प्रेम

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