भारत को बैटरी भंडारण में आत्मनिर्भर बनने में लगेगा एक दशक: रिपोर्ट
भारत को बैटरी भंडारण में आत्मनिर्भर बनने में लगेगा एक दशक: रिपोर्ट
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) भारत को बैटरी भंडारण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने में अभी करीब 10 साल और लग सकते हैं। इसका बैटरी सेल के जरूरी उपकरणों के विनिर्माण की मौजूदा क्षमता और मांग के बीच बड़ा अंतर है। शोध एवं परामर्श कंपनी वुड मैकेंजी ने यह बात कही है।
बैटरी भंडारण पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में प्रतिस्पर्धी निविदाओं से अनुमानित करीब 260 गीगावाट घंटे (जीडब्ल्यूएच) की मांग के मुकाबले भारत की घरेलू बैटरी विनिर्माण क्षमता दो जीडब्ल्यूएच यानी एक प्रतिशत से भी कम है।
वुड मैकेंजी की रिपोर्ट के अनुसार, इससे नीतिगत स्तर पर तेजी के बावजूद भारत बैटरी के लिए आयात पर निर्भर बना हुआ है।
इसमें कहा गया है कि वर्ष 2035 तक 226 जीडब्ल्यूएच से अधिक सेल विनिर्माण क्षमता स्थापित करने की घोषणाओं के बावजूद परियोजनाओं में देरी, वित्तीय व्यावहारिकता को लेकर चुनौतियां और चीन तथा दक्षिण कोरिया की प्रौद्योगिकी पर निर्भरता के कारण भारत अभी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बैटरी सेल उद्योग से 10 से 15 साल दूर है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 तक भारत में केवल दो जीडब्ल्यूएच की बैटरी सेल विनिर्माण क्षमता चालू हुई है, जबकि चीन की संचयी क्षमता 2,695 जीडब्ल्यूएच है। चीन कैथोड, एनोड, सेपरेटर और इलेक्ट्रोलाइट जैसे बैटरी आपूर्ति श्रृंखला के प्रमुख हिस्सों में 85 से 98 प्रतिशत तक वैश्विक क्षमता नियंत्रित करता है।
इस अंतर को कम करने के लिए भारत को अपने विनिर्माण परिवश में व्यापक बदलाव करने होंगे।
वुड मैकेंजी की निदेशक अंकिता चौहान ने कहा, ‘‘भारत की बैटरी भंडारण संबंधी महत्वाकांक्षाएं मजबूत हैं, लेकिन नीतिगत इरादे और वास्तविक उत्पादन क्षमता के बीच बड़ा अंतर है।’’
उन्होंने कहा कि निकट भविष्य में कंटेनर और बैटरी पैक जैसे अंतिम स्तर के उपकरणों के विनिर्माण में अवसर हैं। इनके लिए स्थानीय उत्पादन तकनीकी रूप से संभव और व्यावसायिक रूप से लाभकारी है।
चौहान ने कहा कि आत्मनिर्भर सेल उद्योग तैयार करने की चुनौती अधिक कठिन है और इसके लिए एक दशक या उससे अधिक समय तक लगातार और लक्षित निवेश की जरूरत होगी, जो मौजूदा प्रोत्साहन योजनाओं से कहीं अधिक होना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विनिर्मित बैटरी सेल आयातित सेल की तुलना में 25 से 40 प्रतिशत तक महंगे हो सकते हैं। इसकी वजह सीमित उत्पादन स्तर, अधिक वित्तीय लागत और कमजोर आपूर्तिकर्ता परिवेश है।
हालांकि, भारत की लागत स्थिति वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है। भारत लागत के नजरिये से जापान की तुलना में 154 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया की तुलना में नौ प्रतिशत फायदे की स्थिति में है। प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है।
रिपोर्ट के अनुसार, अगले दो से पांच वर्षों में बैटरी सेल विनिर्माण में आयातित कच्चे माल के साथ धीरे-धीरे विकास होने की उम्मीद है, जबकि पूरी तरह से परिशोधन क्षमता विकसित करने में 10 साल से अधिक समय लग सकता है।
भाषा रमण अजय
अजय

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