उर्वरक कंपनियों को हरित अमोनिया की आपूर्ति में कम से कम 3 साल लगेंगे
उर्वरक कंपनियों को हरित अमोनिया की आपूर्ति में कम से कम 3 साल लगेंगे
नयी दिल्ली, 31 मार्च (भाषा) भारतीय उर्वरक कंपनियों को इस सप्ताह हस्ताक्षरित महत्वपूर्ण अनुबंधों के तहत घरेलू हरित अमोनिया की आपूर्ति 2028 से पहले नहीं मिल पाएगी, क्योंकि उत्पादकों को पहले नए विनिर्माण संयंत्र बनाने होंगे। उद्योग जगत के अधिकारियों ने मंगलवार को यह बात कही।
इफको, कोरोमंडल इंटरनेशनल, पारादीप फॉस्फेट्स (पीपीएल), ओस्तवाल और इंडोरामा इंडिया ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (एनजीएचएम) के तहत पांच घरेलू उत्पादकों से सालाना 6.7 लाख टन हरित अमोनिया खरीदने के लिए 10 साल के समझौते पर सोमवार को हस्ताक्षर किए।
अधिकारियों ने हालांकि आगाह किया कि असल आपूर्ति में अभी कई साल लगेंगे।
इफको के निदेशक बिरिंदर सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ वे इसकी आपूर्ति तीन साल बाद करेंगे और उसके बाद 10 साल तक करते रहेंगे। इसलिए, मौजूदा पश्चिम एशिया संकट में इससे कोई मदद नहीं मिलेगी।’’
इफको का समझौता दो लाख टन हरित अमोनिया खरीदने के लिए है जिसकी कीमत 49.75 रुपये प्रति किलोग्राम और 54.73 रुपये प्रति किलोग्राम तय की गई है।
पीपीएल के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एन. सुरेश कृष्णन ने भी यही बात दोहराई और कहा कि नए अमोनिया संयंत्र को चालू होने में आमतौर पर तीन साल लगते हैं।
उन्होंने बताया कि पारादीप (ओडिशा) और गोवा के पास एक-एक संयंत्र लगाया जा रहा है जिससे पीपीएल के अनुबंध के तहत 1.25 लाख टन अमोनिया की आपूर्ति की जाएगी।
पीपीएल ने 55.75 रुपये प्रति किलोग्राम से लेकर 62.84 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत सीमा में हरित अमोनिया खरीदने का अनुबंध किया है।
भारत अभी अपनी मांग को पूरा करने के लिए खासकर उर्वरकों के मामले में आयात पर निर्भर है।
केवल इफको ही सालाना करीब आठ लाख टन ‘ग्रे’ अमोनिया आयात करता है जिससे उर्वरक विनिर्माता वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव एवं आपूर्ति में रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। ये रुकावटें पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण और भी बढ़ गई हैं।
‘ग्रे’ अमोनिया वह अमोनिया है जिसे जीवाश्म ईंधन से उत्पादित किया जाता है और इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
कृष्णन ने कहा कि हरित अमोनिया की कीमत (प्राइस प्रीमियम) पारंपरिक ‘ग्रे’ अमोनिया के मुकाबले अभी करीब 200 डॉलर प्रति टन अधिक है लेकिन उम्मीद है कि जब तक आपूर्ति शुरू होगी, तब तक यह अंतर काफी कम हो जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘‘ हम सभी का मानना है कि जब तक इसकी आपूर्ति शुरू होगी, तब तक कीमतों का यह अंतर काफी हद तक कम हो चुका होगा।’’
अधिकारियों ने बताया कि उर्वरक विभाग ने कंपनियों को हरित और ‘ग्रे’ अमोनिया के बीच कीमत के किसी भी अंतर की भरपाई करने पर सहमति जताई है। इस प्रावधान को आपूर्ति समझौतों में शामिल किया गया है।
सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एसईसीआई) ने इन अनुबंधों के लिए नोडल एजेंसी के तौर पर काम किया जो पूरे देश में उर्वरक इकाइयों को आपूर्ति से जोड़ती है।
हरित अमोनिया जीवाश्म ईंधन के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले ‘इलेक्ट्रोलिसिस’ के जरिये बनाया जाता है औा उर्वरक उत्पादन के लिए एक शून्य-कार्बन विकल्प प्रदान करता है। यह पारंपरिक ‘ग्रे’ अमोनिया की जगह लेकर सीधे तौर पर नाइट्रोजन उर्वरक विनिर्माण को कार्बन मुक्त बनाएगा।
भाषा राजेश
राजेश निहारिका
निहारिका

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