महाराष्ट्र चैरिटी आयुक्त ने 1989 में टाटा संस के शेयर हस्तांतरण की शिकायत सबंधी जांच बंद की
महाराष्ट्र चैरिटी आयुक्त ने 1989 में टाटा संस के शेयर हस्तांतरण की शिकायत सबंधी जांच बंद की
नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) महाराष्ट्र चैरिटी आयुक्त ने नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट से दिवंगत नवल एच. टाटा को 1989 में टाटा संस के 833 शेयर के हस्तांतरण की जांच की मांग वाली शिकायत को यह कहते हुए निस्तारित कर दिया कि यह लेनदेन उस समय लागू कानून के अनुरूप था। टाटा ट्रस्ट्स ने बृहस्पतिवार को बयान में यह जानकारी दी।
दो सितंबर को दिए गए आदेश में 10 जून को नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (एनआरटीटी) के न्यासी विजय सिंह द्वारा दायर शिकायत का निस्तारण किया गया। इसमें मौजूदा टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के पिता नवल एच. टाटा को करीब चार दशक पुराने शेयर हस्तांतरण की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा, ‘‘टाटा ट्रस्ट्स को महाराष्ट्र राज्य, मुंबई के चैरिटी आयुक्त का दो सितंबर, 2026 का आदेश मिला है जिसमें एनआरटीटी के न्यासी विजय सिंह द्वारा 10 जून, 2026 को ईमेल के जरिये दी गई शिकायत का निपटारा किया गया है। इस शिकायत में 1989 में एनआरटीटी से टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड के 833 शेयर नवल एच. टाटा को हस्तांतरित किए जाने की जांच की मांग की गई थी।’’
बयान में कहा गया, ‘‘टाटा ट्रस्ट्स का यह दावा सही साबित हुआ है कि शेयर के हस्तांतरण से जुड़े आरोप निराधार, बिना सबूत के और दुर्भावनापूर्ण लगाए गए थे। ये आरोप टाटा ट्रस्ट्स को बदनाम करने की एक दुर्भावनापूर्ण और सोची समझी साजिश का हिस्सा थे। इसका एकमात्र उद्देश्य टाटा ट्रस्ट्स की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था। यह ऐसी संस्था है, जिसने 130 से अधिक वर्षों से देश की सेवा की है और सार्वजनिक विश्वास, जवाबदेही तथा नैतिक आचरण के उच्चतम मानकों को लगातार बनाए रखा है।’’
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, शिकायत, ट्रस्ट के जवाब और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद आयुक्त ने निष्कर्ष निकाला कि महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत आगे किसी जांच की जरूरत नहीं थी।
बयान के अनुसार, आयुक्त ने पाया कि वैधानिक आवश्यकताओं के कारण इन शेयर की बिक्री जरूरी थी और शेयर हस्तांतरण उचित दस्तावेजों पर आधारित था।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि ट्रस्ट को दी गई राशि का निर्धारण आयकर विभाग के संपत्ति कर आयुक्त द्वारा सहमत मूल्यांकन के आधार पर किया गया था और ट्रस्ट को इस लेनदेन से लाभ हुआ था, जो 31 मार्च, 1989 के उसके बही-खाते में दर्ज था।
इसमें यह भी पाया गया कि शेयर इस शर्त के साथ हस्तांतरित किए गए थे कि उन्हें किसी तीसरे पक्ष को नहीं बेचा जाएगा और वे प्राप्तकर्ता के परिवार के पास ही रहेंगे।
बयान में कहा गया कि आयुक्त ने निष्कर्ष निकाला कि यह हस्तांतरण उस समय लागू कानून के अनुरूप किया गया था।
यह विवाद इस साल उस समय फिर सामने आया जब आरोप लगाए गए कि सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के पास रखे गए शेयर को नवल टाटा को व्यक्तिगत हैसियत से पर्याप्त प्रतिफल, न्यासियों की मंजूरी या जरूरी दस्तावेजों के बिना हस्तांतरित किया गया था। टाटा ट्रस्ट्स ने इन आरोपों से इनकार किया था।
चैरिटी आयुक्त ने इससे पहले जांच लंबित रहने तक सर रतन टाटा ट्रस्ट को बैठकें करने से रोक दिया था। इस पाबंदी का असर ट्रस्ट पर आगे भी पड़ा क्योंकि एसआरटीटी, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के साथ मिलकर टाटा संस का एक प्रमुख शेयरधारक है।
दोनों ट्रस्ट के पास टाटा संस की करीब 51.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दोनों द्वारा संयुक्त रूप से किसी प्रतिनिधि को नामित नहीं कर पाने के कारण टाटा संस की 18 अगस्त को हुई वार्षिक आम बैठक में कोरम पूरा नहीं हो सका। इसके चलते बैठक स्थगित करनी पड़ी, जो समूह के इतिहास में पहली बार हुआ।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने कहा कि फरवरी 2027 में उनका मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह एक और कार्यकाल के लिए दावेदारी नहीं करेंगे। इसके बाद उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिसमें टाटा संस के प्रमुख शेयरधारक के रूप में टाटा ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण भूमिका है।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि आयुक्त के निष्कर्षों से उसकी यह स्थिति सही साबित हुई है कि आरोप ‘‘निराधार, बिना सबूत के और दुर्भावनापूर्ण’’ थे। ट्रस्ट्स ने कुछ अज्ञात पक्षों पर उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से अभियान चलाने का आरोप लगाया।
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, आयुक्त ने सिंह के आचरण की भी आलोचना की। आदेश में कहा गया कि सिंह ने 10 जून की अपनी शिकायत वाला ईमेल ट्रस्ट को उपलब्ध नहीं कराया, जिससे संकेत मिलता है कि वह इसे अन्य न्यासियों और पूरे ट्रस्ट से छिपाना चाहते थे। आयुक्त ने उनके इस आचरण को न्यासी के पद के अनुरूप नहीं बताया।
आयुक्त ने कहा कि सिंह ने आठ जून को हुई बोर्ड की बैठक में उस प्रस्ताव में भाग लिया था, जिसके तहत एनआरटीटी को चैरिटी आयुक्त के समक्ष अपना पक्ष रखना था। लेकिन इसके दो दिन बाद उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए अपनी शिकायत दायर कर दी।
यह विवाद उन शेयर से जुड़ा है, जो 1974 में स्थापित नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट के पास थे। इस साल की शुरुआत में सामने आए एक कानूनी नोटिस में दी गई जानकारी के अनुसार, सर रतन टाटा ट्रस्ट ने दिसंबर 1974 में 625 टाटा संस इक्विटी शेयर और 34 वरीयता शेयर कोष में दान के रूप में एनआरटीटी को हस्तांतरित किए थे। 1979 में बोनस शेयर जारी होने के बाद एनआरटीटी की इक्विटी हिस्सेदारी बढ़कर 833 शेयर हो गई।
कानूनी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि उस समय एनआरटीटी के न्यासी रहे नवल टाटा ने जनवरी 1989 में ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था और इसके कुछ समय बाद 833 शेयर व्यक्तिगत रूप से उन्हें हस्तांतरित कर दिए गए। इसमें हस्तांतरण के लिए दिए गए प्रतिफल तथा उससे जुड़े दस्तावेजों और मंजूरियों पर सवाल उठाए गए थे। ये आरोप थे, चैरिटी आयुक्त के निष्कर्ष नहीं।
टाटा ट्रस्ट्स ने पहले कहा था कि यह लेनदेन कानूनी था, पर्याप्त प्रतिफल के बदले किया गया था और उस समय लागू नियमों के अनुरूप था। उसने यह भी कहा था कि लेनदेन को उचित स्तरों पर मंजूरी मिली थी, जिसमें टाटा संस के बोर्ड की मंजूरी भी शामिल थी और हस्तांतरण फॉर्म पर कंपनी रजिस्ट्रार की विधिवत मुहर लगी थी।
टाटा संस का स्वामित्व पूरे टाटा समूह के संचालन और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। टाटा संस समूह की प्रमुख ‘होल्डिंग’ कंपनी और उसकी परिचालन कंपनियों की प्रवर्तक है, जबकि टाटा परिवार से जुड़े परोपकारी ट्रस्ट सामूहिक रूप से इसके करीब दो-तिहाई शेयर के मालिक हैं। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास संयुक्त रूप से बहुमत हिस्सेदारी है।
टाटा ट्रस्ट्स की शुरुआत जमशेदजी टाटा की परोपकारी पहलों से हुई थी। इसकी शुरुआत 1892 में जे.एन. टाटा एंडोमेंट से हुई। बाद में इस नेटवर्क में सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट जैसे प्रमुख ट्रस्ट शामिल हुए, जो आज टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी से प्राप्त आय को परोपकारी गतिविधियों में लगाते हैं।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा

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