(राधा रमण मिश्रा)
नयी दिल्ली,आठ मार्च (भाषा) पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच कच्चे तेल और गैस के दाम में तेज वृद्धि से देश में महंगाई बढ़ने, रुपये की विनिमय दर में गिरावट के साथ कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। अर्थशास्त्री और मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक एन आर भानुमूर्ति ने यह कहा।
अमेरिका और इजराइल का ईरान पर हमले के बाद से कच्चे तेल की कीमत में तेज वृद्धि हुई है और यह 2023 के बाद उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड का भाव बीते शुक्रवार को लगभग 8.5 प्रतिशत चढ़कर 92.69 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया जो एक सप्ताह पहले 70 डॉलर के आसपास था। वहीं अमेरिकी मानक न्यूयॉर्क में वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट कच्चा तेल 12.2 प्रतिशत बढ़कर 90.9 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। 28 फरवरी को समाप्त सप्ताह की तुलना में ब्रेंट क्रूड के भाव में लगभग 32 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। एलएनजी की कीमतें भी लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।
अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमले और पश्चिम एशिया में जारी अनिश्चितता का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर भानुमूर्ति ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था पर तत्काल प्रभाव व्यापार और वित्त चैनलों के माध्यम से होगा। रुपये की विनिमय दर में गिरावट और विदेशी पूंजी की निकासी के रूप में यह पहले ही दिखाई दे चुका है, जिसके कारण घरेलू शेयर बाजार में भारी गिरावट आई है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘तेल बाजारों में कीमतों में तेज वृद्धि हमारे व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे को भी प्रभावित करेगी। अगर वैश्विक स्तर पर तेल के दाम में वृद्धि को देखते हुए, घरेलू खुदरा कीमतें बढ़ाई जाती हैं, तो देश में तेल की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है। खुदरा बाजारों में गैस की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं।’’
उल्लेखनीय है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल के बीच शनिवार को घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की कीमत में 60 रुपये और वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 114.5 रुपये की भारी वृद्धि की गई है। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने साफ कहा है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की कोई योजना नहीं है, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के पास इस बोझ को सहने के लिए पर्याप्त वित्तीय क्षमता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य के बाधित होने से जुड़े एक अन्य सवाल के जवाब में जाने-माने अर्थशास्त्री भानुमूर्ति ने कहा, ‘‘होर्मुज जलडमरूमध्य खाड़ी से भारतीय तेल और गैस के लिए एक प्रमुख पारगमन मार्ग है। इसके बाधित होने से न केवल भारतीय ‘क्रूड बास्केट’ (अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों का भारांश औसत, जिनकी खरीद भारतीय रिफाइनरी करते हैं) की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाएं भी प्रभावित होंगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘कतर ने पहले ही गैस उत्पादन बंद कर दिया है। हालांकि, भारत के रूस से तेल आयात करने से विश्व तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन गैस चिंता का विषय बनी रहेगी। खुदरा स्तर पर, चूंकि कई क्षेत्रों में गैस और तेल एक दूसरे के पूर्ण विकल्प हैं, इसलिए तेल पर गैस की कीमतों का व्यापक प्रभाव पड़ेगा।’’
उल्लेखनीय है कि होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा जलमार्ग है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर लगभग 55 किलोमीटर चौड़ा यह जलडमरूमध्य वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से ऊर्जा व्यापार के लिए,सबसे महत्वपूर्ण और अत्यधिक उपयोग किए जाने वाले समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है।
ऊर्जा (कच्चा तेल, गैस) की कीमतें में और वृद्धि तथा कच्चा तेल के 100 डॉलर या उससे अधिक होने से मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर भानुमूर्ति ने कहा, ‘‘घरेलू मुद्रास्फीति पर वैश्विक तेल कीमतों के प्रभाव का अनुमान हम इस बात से लगा सकते हैं कि तेल की कीमतों में 10 डॉलर की वृद्धि से मुद्रास्फीति में 0.7 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। इसलिए, यदि युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 60 डॉलर की तुलना में यह 100 डॉलर तक पहुंच जाती है, तो यह एक महत्वपूर्ण वृद्धि होगी।’’
रुपये की विनिमय दर पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा, ‘‘ युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद, रुपये की विनमय दर (डॉलर के मुकाबले) 92.19 तक पहुंच गयी थी। हालांकि, यह बाद में 92 से नीचे आ गया। कुछ समाचार रिपोर्ट के अनुसार आरबीआई के हस्तक्षेप के कारण संभवत: रुपये में सुधार आया।’’
भानुमूर्ति ने कहा, ‘‘ लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें घरेलू मुद्रास्फीति को कैसे प्रभावित करती हैं और विदेशी पूंजी प्रवाह की स्थिति क्या रहती है। वर्तमान स्थिति के अनुसार, अर्थव्यवस्था की स्थिरता को देखते हुए भारत विदेशी पूंजी के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है। हालांकि, यह वर्तमान वैश्विक घटनाक्रमों से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता है।’’
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 18 पैसे टूटकर 91.82 पर बंद हुआ। वहीं शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुद्ध रूप से 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। साप्ताहिक आधार पर देखें तो बीते सप्ताह बीएसई सेंसेक्स 2,368.29 अंक यानी 2.91 प्रतिशत टूटा, जबकि एनएसई निफ्टी 728.2 अंक यानी 2.89 प्रतिशत के नुकसान में रहा।
भाषा रमण रमण पाण्डेय
पाण्डेय