एनसीएलएटी ने रोल्टा इंडिया की समाधान योजना पर दूरसंचार विभाग की याचिका खारिज की

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एनसीएलएटी ने रोल्टा इंडिया की समाधान योजना पर दूरसंचार विभाग की याचिका खारिज की

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  • Publish Date - August 2, 2026 / 11:56 AM IST,
    Updated On - August 2, 2026 / 11:56 AM IST

नयी दिल्ली, दो अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने कर्ज के बोझ से दबी रोल्टा इंडिया लिमिटेड की समाधान योजना को चुनौती देने वाली दूरसंचार विभाग की याचिका खारिज कर दी है। न्यायाधिकरण ने कहा कि समाधान योजना को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है और उसका क्रियान्वयन भी पूरा हो चुका है, ऐसे में इस स्तर पर इसमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा मंजूर समाधान योजना को चुनौती देते हुए दावा किया था कि रोल्टा इंडिया पर 469.09 करोड़ रुपये के बकाया लाइसेंस शुल्क की वैधानिक देनदारी है। यह दावा समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) से जुड़े वित्त वर्ष 2005-06 और 2006-07 के बकाये से संबंधित था। डीओटी ने रोल्टा को इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) का लाइसेंस दिया था।

एनसीएलएटी की तीन सदस्यीय पीठ ने एनसीएलटी की मुंबई पीठ के 15 दिसंबर, 2025 के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एशडन प्रॉपर्टीज द्वारा रोल्टा इंडिया के लिए पेश 900 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दी गई थी। पीठ में कार्यवाहक चेयरमैन न्यायमूर्ति योगेश खन्ना के साथ सदस्य बरुण मित्रा और अजय दास मेहरोत्रा शामिल थे।

एनसीएलएटी ने अपने आदेश में कहा कि रोल्टा इंडिया की समाधान प्रक्रिया अंतिम चरण तक पहुंच चुकी है और योजना को लागू किया जा चुका है। एनसीएलटी ने दो फरवरी, 2026 को कंपनी से संबंधित याचिका भी बंद कर दी थी।

न्यायाधिकरण ने कहा कि डीओटी ने समाधान पेशेवर द्वारा उसके दावे को स्वीकार नहीं किए जाने के फैसले को समय पर चुनौती नहीं दी थी। डीओटी ने एनसीएलटी के समक्ष इस वर्गीकरण का विरोध करने के बजाय दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीसैट) में राहत की अपील की थी, जहां मई, 2024 में उसकी याचिका का निपटारा कर दिया गया था।

एनसीएलएटी ने कहा कि कि डीओटी एक परिचालन ऋणदाता था और उसने 31 अगस्त, 2023 को 469.09 करोड़ रुपये का दावा दाखिल किया था। हालांकि, समाधान पेशेवर ने इस दावे को “स्वीकार्य नहीं, लेकिन आकस्मिक” श्रेणी में रखा था।

डीओटी ने दलील दी थी कि समाधान योजना में सरकारी और वैधानिक संस्थाओं के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया। विभाग का कहना था कि जहां सुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं को करीब 808.55 करोड़ रुपये और असुरक्षित वित्तीय ऋणदाताओं को लगभग 64.2 करोड़ रुपये मिलने थे, वहीं सरकारी विभागों के लिए बहुत सीमित राशि का प्रावधान किया गया था।

डीओटी ने यह भी तर्क दिया था कि यह व्यवस्था दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 30(2)(बी) और धारा 53 के तहत निर्धारित भुगतान व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

हालांकि, एनसीएलएटी ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि डीओटी ने समाधान पेशेवर के फैसले के खिलाफ एनसीएलटी में अपील नहीं की और अब योजना के अनुमोदन और सफल क्रियान्वयन के बाद पुराने मुद्दों को उठाया नहीं जा सकता।

पीठ ने उच्चतम न्यायालय के उन फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि समाधान योजना को मंजूरी मिलने के बाद नए दावे पेश नहीं किए जा सकते और सफल समाधान आवेदक को ऐसी अघोषित देनदारियों का बोझ नहीं दिया जा सकता, जिनकी जानकारी समाधान प्रक्रिया के दौरान नहीं थी।

भाषा अजय अजय

अजय