जीएम बीज के बिना दूसरे देश बेहतर दलहन पैदावार हासिल कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं : चौहान

जीएम बीज के बिना दूसरे देश बेहतर दलहन पैदावार हासिल कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं : चौहान

जीएम बीज के बिना दूसरे देश बेहतर दलहन पैदावार हासिल कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं : चौहान
Modified Date: July 16, 2026 / 04:11 pm IST
Published Date: July 16, 2026 4:11 pm IST

नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बृहस्पतिवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से दालों और तिलहनों की उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास तेज करने को कहा।

चौहान ने कहा कि इन क्षेत्रों में भारत अब भी आयात पर काफी निर्भर है।

आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए चौहान ने कहा, ‘‘यदि जीन संवर्धित (जीएम) बीजों के बिना भी अन्य देश दालों की बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं, तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता?’’

उन्होंने कहा कि सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर किसान धान और गेहूं जैसी फसलों की ओर रुख करते हैं। मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और पूर्वी भारत के अन्य हिस्सों में सिंचाई का दायरा बढ़ने के साथ यह प्रवृत्ति देखने को मिली है, जिसके कारण देश को दलहन की मांग पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

कृषि मंत्री ने कहा कि एक एकड़ भूमि में मक्के की पैदावार 100 क्विंटल से अधिक हो सकती है, जबकि धान की लगभग 30-35 क्विंटल और चने या मूंग जैसी दालों की केवल लगभग पांच क्विंटल पैदावार होती है।

उन्होंने इस अंतर को आईसीएआर के वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती बताया।

चौहान ने उर्वरकों के मामले में आत्मनिर्भरता को भी प्राथमिकता बताते हुए कहा कि देश कब तक इनके आयात पर निर्भर रहेगा। भारत हर वर्ष लगभग 60-70 लाख टन दालों और 1.5 से 1.6 करोड़ टन खाद्य तेलों का आयात करता है।

उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ अब गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

कृषि मंत्री ने अल नीनो जैसी जलवायु संबंधी चुनौतियों से प्रभावित क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक योजनाएं तैयार करने और राज्यों के साथ उन्हें साझा करने के लिए आईसीएआर की सराहना की।

हालांकि, उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए केवल आकस्मिक योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं और उच्च गुणवत्ता वाले निर्यातोन्मुख कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

चौहान ने उन शोध की आलोचना की, जो किसानों की जरूरतों के बजाय केवल शोध पत्र प्रकाशित करने के उद्देश्य से किए जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा शोध, जिससे केवल शोध पत्र तैयार हों, समय की बर्बादी है। अनुसंधान का उद्देश्य देश, भूमि, मिट्टी और किसानों की जरूरतों को पूरा करना होना चाहिए।’’

उन्होंने किसानों की ओर से उठाई गई समस्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गन्ने की लोकप्रिय किस्म ‘238’ की गुणवत्ता में गिरावट आई है और उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

चौहान ने कहा कि बिहार के किसानों ने लीची के भंडारण की अवधि बढ़ाने के लिए भी अनुसंधान की मांग की है, क्योंकि इसकी फसल दो से तीन दिन में खराब हो जाती है।

चौहान ने आईसीएआर की लगभग 52 शोध टीमों से अपने कार्यों में तेजी लाने और ठोस परिणाम देने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान केवल अनाज उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने पर है। इसके लिए बागवानी, मत्स्य पालन, पशुपालन, कुक्कुट पालन और बकरी पालन को कृषि के साथ जोड़कर एकीकृत कृषि मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

आईसीएआर के 100वें स्थापना वर्ष के अवसर के लिए चौहान ने कुछ लक्ष्य भी प्रस्तावित किए। इनमें 100 जलवायु-स्मार्ट गांव विकसित करना, कृत्रिम मेधा (एआई), रोबोटिक्स, जीन संपादन और जलवायु-स्मार्ट कृषि जैसे क्षेत्रों में कार्य के लिए 100 युवा वैज्ञानिकों की नियुक्ति करना तथा आईसीएआर के प्रत्येक संस्थान और संबद्ध कृषि विश्वविद्यालय द्वारा दो वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालने वाला कम से कम एक नवोन्मेषण विकसित करना शामिल है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आईसीएआर की प्रत्येक इकाई एक आकांक्षी जिले को अपनाए और वहां कृषि रूपांतरण का एक अनुकरणीय मॉडल विकसित करे।

कृषि मंत्री ने कहा कि किसानों को अनुसंधान, परामर्श सेवाओं और नई कृषि प्रौद्योगिकी की जानकारी सीधे मोबाइल फोन पर उपलब्ध कराने के लिए ‘आईसीएआर ओपन डिजिटल नॉलेज प्लेटफॉर्म’ स्थापित किया जाना चाहिए।

उनका लक्ष्य है कि आईसीएआर के 100 वर्ष पूरे होने तक कम से कम 10 करोड़ किसानों को उसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रत्यक्ष लाभ मिले।

उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि आईसीएआर के वैज्ञानिक स्थापना वर्ष समारोह से पहले एक सप्ताह से 10 दिन तक गांवों में रहकर किसानों के साथ काम करें। साथ ही, प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) कम से कम 100 गांवों को कवर करे और उन्हें प्रशिक्षण केंद्रों के बजाय नवाचार, जलवायु परामर्श, स्टार्टअप सहायता और कृषि प्रौद्योगिकी प्रदर्शन केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए।

भाषा योगेश अजय

अजय


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