प्राथमिकता क्षेत्रों को कर्ज में आर्थिक की जगह सामाजिक समता पर हो जोरः ईएसी-पीएम

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प्राथमिकता क्षेत्रों को कर्ज में आर्थिक की जगह सामाजिक समता पर हो जोरः ईएसी-पीएम

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  • Publish Date - May 6, 2026 / 06:38 PM IST,
    Updated On - May 6, 2026 / 06:38 PM IST

नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) ने सुझाव दिया है कि प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण (पीएसएल) संबंधी मानदंडों का फोकस आर्थिक दक्षता से हटाकर सामाजिक समता की तरफ करना चाहिए, क्योंकि कम दक्षता वाले क्षेत्रों में कर्ज का प्रवाह कुल उत्पादकता को नुकसान पहुंचा सकता है।

परिषद ने ‘प्राथमिकता क्षेत्र को कर्ज के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण’ शीर्षक से जारी एक कार्यपत्र में कहा है कि पीएसएल का जोर इसके मूल उद्देश्यों पर होना चाहिए, जिसमें छोटे एवं सीमांत किसानों, लघु उद्योगों और कमजोर वर्गों को कर्ज उपलब्ध कराना शामिल है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिकता वाले क्षेत्र की परिभाषा में शामिल कुछ पुराने प्रावधान अब प्रासंगिक नहीं रहे हैं और उन्हें हटाया जा सकता है। इसके साथ ही लक्ष्यों में भी उसके हिसाब से बदलाव किया जाना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर, छोटे एवं सीमांत किसानों और गैर-कॉरपोरेट किसानों के लिए उप-लक्ष्य बनाए रखते हुए कृषि क्षेत्र के समग्र लक्ष्य को हटाने पर विचार किया जा सकता है।

इसी तरह, सूक्ष्म उद्यमों और कमजोर वर्गों के लिए उप-लक्ष्य बनाए रखते हुए अन्य श्रेणियों को प्राथमिकता क्षेत्र की परिभाषा से बाहर किया जा सकता है और कुल लक्ष्य को भी कम किया जा सकता है। इससे बैंकों को पूंजी आवंटन में अधिक लचीलापन मिलेगा और सामाजिक उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्देशित ऋण नीतियों से आर्थिक जोखिम भी पैदा होता है। कम दक्षता वाले क्षेत्रों को कर्ज देने से उत्पादकता पर असर पड़ सकता है, साथ ही चूक का जोखिम और परिसंपत्ति प्रबंधन लागत बढ़ने से बैंकों की लाभप्रदता भी प्रभावित होती है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 2020-2025 के जिला-स्तरीय तिमाही आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि देश में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का वितरण असंतुलित है।

रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्रों (पीएसएलसी) से बैंकों को लचीलापन मिलता है और क्षेत्रीय वितरण में बड़े बदलाव के बगैर एक प्रभावी अप्रत्यक्ष साधन के रूप में काम करते हैं।

भारत में प्राथमिकता क्षेत्र को कर्ज की नीति करीब पांच दशकों से लागू है और बैंकों के लिए अपने कुल कर्ज का न्यूनतम 40 प्रतिशत इस क्षेत्र में देना अनिवार्य है। इस क्षेत्र में छोटे एवं सीमांत किसान, सूक्ष्म उद्यम और कमजोर वर्ग शामिल हैं।

भाषा प्रेम

प्रेम रमण

रमण