नयी दिल्ली, 16 अगस्त (भाषा) केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों और विभागों से भविष्य के सरकारी खरीद अनुबंधों में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) की जगह उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ने को कहा है।
व्यय विभाग ने 13 जुलाई के एक कार्यालय ज्ञापन में कहा कि जब पीपीआई उपलब्ध हो जाए, तब भविष्य के अनुबंधों में मूल्य-वृद्धि और दर समायोजन की धाराओं में डब्ल्यूपीआई के स्थान पर पीपीआई को अपनाने के लिए मंत्रालयों और विभागों को प्रोत्साहित किया जाए।
सरकारी अनुबंधों में मूल्य वृद्धि या दर परिवर्तन की धारा के तहत परियोजना के दौरान सामग्री, श्रम और ईंधन जैसी प्रमुख लागत में बदलाव के अनुसार भुगतान में समायोजन किया जाता है। इससे महंगाई के प्रभाव को सरकार और ठेकेदार के बीच बांटने में मदद मिलती है।
सरकार का मानना है कि पीपीआई उत्पादक स्तर पर कीमतों में बदलाव को बेहतर ढंग से दर्शाता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिक स्वीकार्य सूचकांक है। भारत में वाणिज्य मंत्रालय ने जून, 2026 से वस्तुओं और सेवाओं के लिए मासिक पीपीआई आंकड़े जारी करना शुरू किया है।
वस्तुओं के पीपीआई में विनिर्मित उत्पादों का सबसे अधिक 69.93 प्रतिशत भारांश है। इसके बाद कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र का 22.16 प्रतिशत, बिजली का 4.49 प्रतिशत तथा खनन एवं संबद्ध क्षेत्र का 3.42 प्रतिशत भारांश है।
सेवा क्षेत्र में पहले चरण में सात सेवाओं….बैंकिंग, प्रतिभूति लेनदेन, बीमा, पेंशन कोष प्रबंधन, रेलवे, हवाई यात्री सेवाओं और दूरसंचार को शामिल किया गया है। बाकी सेवाओं को अगले चरण में शामिल किया जाएगा।
पीपीआई की शुरुआत को विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अपनाई जाने वाली व्यवस्था के अनुरूप माना जा रहा है। यह कदम डब्ल्यूपीआई से पीपीआई की ओर भारत के संभावित दीर्घकालिक बदलाव का संकेत देता है।
भाषा अजय
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