मुंबई, पांच अगस्त (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए कर्ज पर ब्याज दरों से जुड़ी नियामकीय रूपरेखा को अधिक सरल, तर्कसंगत और सिद्धांत-आधारित बनाने का प्रस्ताव किया।
इस कदम का उद्देश्य विभिन्न वित्तीय संस्थानों के बीच ब्याज दर निर्धारण के नियमों में एकरूपता लाना, पारदर्शिता बढ़ाना और ग्राहकों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चालू वित्त वर्ष की तीसरी मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘कर्ज पर ब्याज दरों में पारदर्शिता बढ़ाने और उपभोक्ताओं के हितों को मजबूत करने के उद्देश्य से सभी विनियमित संस्थाओं के लिए ब्याज दरों से संबंधित नियामकीय रूपरेखा में एकरूपता लाने और मानकीकृत करने का प्रस्ताव है।’’
आरबीआई के अनुसार, प्रस्तावित बदलावों के तहत उसके दायरे में आने वाले सभी विनियमित संस्थाओं (बैंक, एनबीएफसी आदि) के लिए ब्याज दर संबंधी दिशा-निर्देशों को युक्तिसंगत बनाया जाएगा, जबकि संस्थानों के आकार और प्रकृति के अनुसार आवश्यक लचीलापन भी बरकरार रखा जाएगा।
इस पहल के तहत मौजूदा कोष की सीमांत लागत आधारित ब्याज दर (एमसीएलआर) और बाह्य मानक ब्याज दर (ईबीएलआर) व्यवस्था से जुड़े कुछ परिचालन संबंधी मुद्दों का समाधान भी किया जाएगा।
साथ ही, केंद्रीय बैंक ब्याज की गणना के लिए अपनाई जाने वाली ‘डे काउंट कन्वेंशन’ (दिनों की गणना की पद्धति) और बेंचमार्क रीसेट तिथियों जैसी अलग-अलग प्रचलित बाजार गतिविधियों को भी मानकीकृत करेगा, ताकि सभी बैंकों के बीच एक समान व्यवस्था लागू हो सके।
आरबीआई का मानना है कि इन प्रस्तावित उपायों से कर्ज मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ेगी, मौद्रिक नीति के फैसलों का असर ग्राहकों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचेगा, ब्याज दरों के निर्धारण में एकरूपता आएगी और उपभोक्ताओं के हितों को और मजबूती मिलेगी।
केंद्रीय बैंक ने कहा है कि इन प्रस्तावों को शामिल करते हुए दिशानिर्देशों का मसौदा जल्द जारी किया जाएगा।
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रमण अजय
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