नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) भारत में डिजिटल परिवहन की अगली लहर पारंपरिक मंच के दायरे से बाहर निकल रही है। अब बड़ी कंपनियों द्वारा ग्राहकों को नियंत्रित करने और प्रत्येक यात्रा पर कमीशन लेने वाले मॉडल की जगह ‘सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस’ (एसएएएस) मंच और खुले नेटवर्क ले रहे हैं। इससे स्वतंत्र चालकों और स्थानीय परिचालकों के लिए अपने वाहनों को ऑनलाइन जोड़ना सस्ता हो गया है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव भारत के दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इन शहरों में तिपहिया, टैक्सी और साझा वाहनों की मांग तो है, लेकिन पारंपरिक एग्रीगेटर कंपनियां अपने व्यापार मॉडल को व्यावहारिक बनाने के लिए जरूरी चालक और ग्राहक संख्या जुटाने के लिए संघर्ष करती रही हैं।
प्रत्येक परिवहन व्यवसाय के लिए अपना अलग उपभोक्ता ऐप, मैपिंग, डिस्पैच, भुगतान और डेटा ढांचा तैयार करने के बजाय एसएएएस मंच स्थानीय बेड़े के मालिकों, स्वतंत्र टैक्सी तथा तिपहिया परिचालकों और सहकारी समितियों को पहले से तैयार डिजिटल प्रणालियों से जुड़ने की सुविधा देते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, इसके चलते एक नया मॉडल उभर रहा है जिसमें स्थानीय व्यवसायी वाहनों की आपूर्ति का स्वामित्व या प्रबंधन संभालते हैं, प्रौद्योगिकी कंपनियां डिजिटल बुनियादी ढांचा प्रदान करती हैं और खुले नेटवर्क उस आपूर्ति को ग्राहकों से जोड़ते हैं।
इस मॉडल के सबसे बड़े उदाहरणों में से एक रैपिडो ने पारंपरिक कमीशन-आधारित व्यवस्था को छोड़ दिया है। कंपनी की नई व्यवस्था में चालक भागीदार यानी ‘कैप्टन’ मंच का उपयोग करने के लिए एक निश्चित शुल्क का भुगतान करते हैं और ग्राहकों से सीधे किराया लेते हैं। कंपनी के अनुसार, इसका सदस्यता शुल्क प्रतिदिन 19 रुपये या 29 रुपये तक हो सकता है। यह मॉडल उन चालकों के लिए अधिक आकर्षक हो जाता, जो दिन भर में अधिक फेरे लगाते हैं।
हालांकि, मंच के लिहाज से देखें तो इस बदलाव के कारण प्रति चालक होने वाली कमाई में भारी गिरावट आती है। ऐसे में इस मॉडल को व्यावहारिक बनाए रखने के लिए कंपनी को चालकों के बहुत बड़े आधार और यात्राओं की अधिक संख्या पर निर्भर रहना पड़ता है।
भाषा अजय पाण्डेय
अजय