(लक्ष्मी देवी ऐरे)
नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ (एनएफसीएसएफ) के प्रमुख प्रकाश नाइकनवारे ने रविवार को कहा कि चीनी की कुछ खेप 15 अक्टूबर से पहले भारत पहुंच सकती हैं, लेकिन इस समय यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कितनी मात्रा में चीनी आएगी।
उन्होंने कहा कि फिलहाल ब्राजील ही चीनी आयात का व्यावहारिक स्रोत है। पारंपरिक आपूर्तिकर्ता थाईलैंड में खुद चीनी की कमी होने के कारण वहां से आयात की संभावना नहीं है।
नाइकनवारे ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि ब्राजील से भारतीय बंदरगाहों तक चीनी पहुंचने में आमतौर पर 40-45 दिन लगते हैं। इसके बाद बंदरगाह से चीनी मिल तक माल पहुंचने में भी समय लगता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए 15 अक्टूबर से पहले कितनी चीनी पहुंच सकती है, इसका आंकड़ा देना मुश्किल है, लेकिन उस तारीख तक कुछ खेप के पहुंचने की अच्छी संभावना है।’’
नाइकनवारे ने कहा कि सरकार द्वारा 31 अक्टूबर तक खेप पहुंचने की समयसीमा को सख्ती से लागू करने की संभावना नहीं है और इस तारीख के बाद भारत पहुंचने वाली रास्ते में मौजूद चीनी की खेपों को भी अनुमति दी जा सकती है।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि सरकार उस तारीख के बाद पहुंचने वाली खेपों पर भी विचार करने को तैयार होगी। मुझे नहीं लगता कि इसे सख्त और अंतिम समयसीमा माना जाएगा।’’
सरकार ने 20 अगस्त को घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। सीमित आपूर्ति के कारण देशभर के खुदरा और थोक बाजारों में चीनी की कीमतें एक महीने में 24 प्रतिशत बढ़कर 56-60 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई थीं।
नाइकनवारे ने कहा कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे बंदरगाह वाले राज्यों को आयातित कच्ची चीनी उत्तरी राज्यों की तुलना में जल्दी मिलने की संभावना है। हालांकि, उत्तर भारत के राज्यों को भी पहले इन्हीं बंदरगाहों के जरिये सड़क और रेल मार्ग से चीनी भेजी जाती रही है।
उन्होंने कहा कि महासंघ ने 2025-26 के चीनी सत्र के लिए शुद्ध चीनी उत्पादन का अनुमान 279 लाख टन पर बरकरार रखा है। यह अनुमान सत्र की शुरुआत से ही अपरिवर्तित है, जबकि अन्य उद्योग संगठनों ने अपने अनुमानों में कई बार बदलाव किया है। इसमें एथनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई अनुमानित 24 लाख टन चीनी शामिल नहीं है।
उन्होंने कहा कि एक अक्टूबर से शुरू होने वाले 2026-27 के चीनी सत्र में शुरुआती भंडार करीब 35 लाख टन रहने का अनुमान है। यह करीब 22 लाख टन की मासिक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। नवंबर तक 15-20 लाख टन चीनी का भंडार बचने की उम्मीद है। तब तक शुरुआती पेराई से बाजार में नई आपूर्ति आने लगेगी।
नाइकनवारे ने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि घबराने जैसी कोई स्थिति होगी।’’
यह पूछे जाने पर कि महासंघ के स्थिर उत्पादन अनुमान का सरकार के पहले के निर्यात संबंधी फैसले में असर क्यों नहीं दिखा, उन्होंने कहा कि सरकार ने यह फैसला उद्योग संगठनों के बजाय राज्यों के गन्ना आयुक्तों से मिले आंकड़ों के आधार पर किया था। उस समय आपूर्ति की स्थिति भी निर्यात की अनुमति देने के अनुकूल थी।
उन्होंने कहा कि भारत ने 20 लाख टन के निर्धारित निर्यात कोटे के मुकाबले केवल आठ लाख टन चीनी का निर्यात किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के अनुकूल नहीं होने के कारण निर्यात प्रभावित हुआ। उनके अनुसार, प्रतिबंध नहीं होने पर भी निर्यात 10 लाख टन से अधिक होने की संभावना नहीं थी।
सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए 13 मई को 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी थी।
ये टिप्पणियां केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा द्वारा पिछले शुक्रवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उद्योग पर कीमतें बढ़ाने और भंडार जमा करने के आरोप लगाए जाने के बाद आई हैं।
नाइकनवारे ने कहा कि खाद्य सचिव ने संवाददाता सम्मेलन से पहले महासंघ और भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा विनिर्माता संघ (आईएसएमए) के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी।
उन्होंने पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने और सट्टेबाजी से कीमतें बढ़ने से रोकने का निर्देश दिया था।
उन्होंने कहा कि मिल स्तर पर कीमतें माल एवं सेवा कर (जीएसटी) को छोड़कर 65-67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थीं, जो शनिवार को हुई निविदाओं में पांच रुपये प्रति किलोग्राम घट गईं। उनका अनुमान है कि राज्यों में निगरानी बढ़ने के साथ अगले सप्ताह भी कीमतों में नरमी जारी रहेगी।
नाइकनवारे के अनुसार, केंद्र ने भंडार पर नियंत्रण के लिए चार चरणों में कदम उठाए हैं। इनमें एक से 14 अगस्त के बीच मिल स्तर पर भंडार का भौतिक सत्यापन, कारोबारियों के लिए 200 टन की भंडार सीमा, थोक खरीदारों के लिए अलग सीमा और हाल में कारोबारियों तथा मिल मालिकों के गोदामों का राज्य स्तर पर निरीक्षण शामिल है।
उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में निगरानी के लिए विशेष दल भी तैनात किए गए हैं और महासंघ ने अपने सदस्यों से भी सहयोग करने की अपील की है।
उन्हें उम्मीद है कि अगले सप्ताह स्थिति में काफी सुधार होगा।
उन्होंने कहा कि सहकारी चीनी मिलों ने बड़े पैमाने पर निर्धारित कोटे के भीतर काम किया है और सट्टेबाजी से दूरी बनाए रखी है।
विपक्षी दल पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि इस नीति के कारण चीनी की कीमतें बढ़ रही हैं और आम लोगों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है।
सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कीमतें बढ़ाने के लिए चीनी उद्योग को जिम्मेदार ठहराया है। सरकार का कहना है कि देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी का भंडार मौजूद है।
एक सुपरमार्केट संचालक ने रविवार को बताया कि महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में खुली चीनी की कीमत बढ़कर 75-80 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है।
विशेषज्ञों ने कीमतों में इस तेज वृद्धि के लिए कई कारण बताए हैं और एथनॉल उत्पादन के लिए चीनी की आपूर्ति को इसका मुख्य कारण मानने से इनकार किया है।
महाराष्ट्र के पूर्व चीनी आयुक्त शेखर गायकवाड़ ने कहा कि गन्ने का उत्पादन और प्रति हेक्टेयर उपज दोनों में कमी आ रही है, जिससे कुल चीनी उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि गन्ना उत्पादक प्रमुख राज्यों की संख्या भी घट रही है।
गायकवाड़ ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘भारत में गन्ने का उत्पादन घट रहा है। गन्ने की कुल मात्रा में भी कुछ कमी आई है, जिससे चीनी का कुल उत्पादन प्रभावित हो रहा है। सरकार उत्पादन बढ़ाने के लिए नई नीति बनाती है तो भी उसके परिणाम आने में करीब 30-36 महीने लगेंगे। गन्ना उत्पादन वाले प्रमुख राज्यों की संख्या भी घट रही है। सरकार को एक बार फिर चीनी के भंडार की जांच करनी चाहिए।’’
राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा कि देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में भी गन्ने की पेराई का मौसम छोटा हुआ है।
उन्होंने कहा, ‘‘महाराष्ट्र में गन्ने की पेराई की अवधि भी कम हो गई है। जो मिलें पहले साल में करीब 150 दिन तक गन्ने की पेराई करती थीं, उन्होंने अब इसे घटाकर करीब 100 दिन कर दिया है क्योंकि यह कारोबार अब लाभदायक नहीं रह गया है। हम किसानों को 3,650 रुपये प्रति टन का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) दे रहे हैं, जबकि चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 3,100 रुपये है।’’
भाषा योगेश पाण्डेय
पाण्डेय