सोयाबीन तेल-तिलहन, सीपीओ, पामोलीन, बिनौला की कीमतों में सुधार

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सोयाबीन तेल-तिलहन, सीपीओ, पामोलीन, बिनौला की कीमतों में सुधार

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  • Publish Date - February 26, 2024 / 07:43 PM IST,
    Updated On - February 26, 2024 / 07:43 PM IST

नयी दिल्ली, 26 फरवरी (भाषा) खाद्य तेलों की आपूर्ति में कमी के बीच दिल्ली के तेल-तिलहन बाजार में सोमवार को सोयाबीन तेल-तिलहन, कच्चा पामतेल (सीपीओ) एवं पामोलीन तथा बिनौला तेल कीमतें मजबूत बंद हुईं। जबकि ऊंचा भाव होने के कारण सरसों और मूंगफली तेल-तिलहन के भाव पूर्वस्तर पर बने रहे।

मलेशिया एक्सचेंज में मामूली सुधार है जबकि शिकॉगो एक्सचेंज में फिलहाल घट-बढ़ है।

बाजार सूत्रों ने कहा कि बंदरगाहों पर सोयाबीन डीगम की कम आपूर्ति है तथा मौजूदा समय में यहां आयातित सोयाबीन डीगम (10-11 प्रतिशत) प्रीमियम (अधिक दाम) पर बिक रहा है। यही तेल आज से लगभग तीन माह पूर्व बेछूट आयात हो रहा था और लागत से 5-6 प्रतिशत कम दाम पर बेचा जा रहा था। उस वक्त भी किसी संगठन ने इस स्थिति पर ध्यान नहीं दिया था। अब जबकि आगामी होली जैसे त्योहार का समय है और मार्च-अप्रैल में सॉफ्ट आयल की सबसे अधिक मांग होगी तो मौजूदा नरम तेलों की कमी की स्थिति को देखते हुए इस बात की आशंका है कि अप्रैल-मई के दौरान नरम खाद्य तेलों आयात न बढ़ा दिया जाये। यह चिंता इस कारण हो रही है कि मार्च-अप्रैल के दौरान बाजार में सरसों की पैदावार आने का समय है। इससे एक बार फिर सस्ते आयातित तेलों की मार से सरसों किसानों को नुकसान होना संभव है। यह स्थिति इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करती है कि तेल आयात, अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) इत्यादि के संबंध में कोई ठोस नीतिगत निर्णय पर पहुंचने की आवश्यकता है।

मौजूदा अनिश्चित स्थिति में बहुराष्ट्रीय कंपनियां रोक-रोक अपना माल बेच रही हैं क्योंकि केवल उन्हीं के पास खाद्य तेलों का स्टॉक रखने की क्षमता रह गयी है। देशी कारोबारी तो लंबे समय से जारी घाटे के कारोबार के बाद निचुड़ गये हैं और उनके पास खाद्य तेलों का स्टॉक बनाने की ताकत खत्म हो चुकी है। इस अनिश्चित समय में देश के सोपा और मोपा जैसे तेल संगठनों और छोटे तेल मिलों को तेल उद्योग, तेल मिलों और किसानों की दिक्कतों को सामने लाना चाहिये और उनकी समस्याओं से अवगत कराना चाहिये और इनकी जगह विदेशी कंपनियों के ‘ब्रोकर’ को उनका हित साधने का मौका नहीं देना चाहिये। सरकार को आगे आकर नीतिगत निर्णय और ठोस पहल करनी होगी तभी स्थिति को संभाला जा सकता है।

सूत्रों ने कहा कि अगर सरकार मानती है कि खाद्य तेलों की थोक कीमतों में गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं को मिल रहा है तो वह गलत है। मौजूदा स्थिति में न तो तेल पेराई मिलें, न तेल उद्योग, न किसान और न तो उपभोक्ता को फायदा है। फायदा किसे हो रहा है इसपर ध्यान देना चाहिये। उपभोक्ताओं को सस्ता खाद्य तेल उपलब्ध कराने के लिए हरियाणा सरकार ने राशन की दुकान के माध्यम से सस्ते दाम पर बिक्री का जो सफल मॉडल अपनाया है, उससे सीख लेने की आवश्यकता है।

तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:

सरसों तिलहन – 5,225-5275 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली – 6,025-6,300 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) – 14,700 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली रिफाइंड तेल 2,195-2,470 रुपये प्रति टिन।

सरसों तेल दादरी- 9,800 रुपये प्रति क्विंटल।

सरसों पक्की घानी- 1,670-1,770 रुपये प्रति टिन।

सरसों कच्ची घानी- 1,670 -1,775 रुपये प्रति टिन।

तिल तेल मिल डिलिवरी – 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 10,350 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 9,850 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 8,650 रुपये प्रति क्विंटल।

सीपीओ एक्स-कांडला- 8,400 रुपये प्रति क्विंटल।

बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 8,800 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 9,650 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन एक्स- कांडला- 8,700 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।

सोयाबीन दाना – 4,645-4,675 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन लूज- 4,455-4,495 रुपये प्रति क्विंटल।

मक्का खल (सरिस्का)- 4,050 रुपये प्रति क्विंटल।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय