दो साल मे नौ राज्यों को खुरपका-मुंहपका बीमारी से मुक्त करने का लक्ष्य : मंत्री

दो साल मे नौ राज्यों को खुरपका-मुंहपका बीमारी से मुक्त करने का लक्ष्य : मंत्री

दो साल मे नौ राज्यों को खुरपका-मुंहपका बीमारी से मुक्त करने का लक्ष्य : मंत्री
Modified Date: July 16, 2026 / 07:17 pm IST
Published Date: July 16, 2026 7:17 pm IST

नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) भारत अगले दो साल में कम से कम नौ राज्यों को खुरपका और मुंहपका बीमारी (एफएमडी) से मुक्त करने का लक्ष्य बना रहा है। सरकार को उम्मीद है कि इससे यूरोप के डेयरी बाजार के दरवाज़े खुलेंगे, जो दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक देश के लिए अब तक ज्यादातर पहुंच से बाहर रहा है।

बृहस्पतिवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 98वें स्थापना दिवस को संबोधित करते हुए मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि लगातार स्वदेशी टीकाकरण से एफएमडी के मामलों में भारी कमी आई है। यह वर्ष 2021 के 105 मामलों से घटकर पिछले साल सिर्फ 40 पर आ गया है।

उन्होंने कहा कि जिन नौ राज्यों में बीमारी के मामले लगातार कम रहे हैं और टीकाकरण का काम पूरा हो चुका है, उन्हें अब एफएमडी-मुक्त प्रमाणपत्र के लिए पहली पसंद के तौर पर चुना गया है।

सिंह ने कहा, ‘‘दूध उत्पादन में दुनिया में सबसे आगे होने के बावजूद, हमें डेयरी उत्पादों के निर्यात में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि विकसित देशों, खासकर यूरोप में, एफएमडी-मुक्त प्रमाणीकरण की जरूरत होती है। प्रधानमंत्री ने वर्ष 2030 तक भारत को एफएमडी-मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है।’’

उन्होंने कहा कि विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन से प्रमाणीकरण मिलने के बाद, ये नौ राज्य भारत को उन बाजारों में डेयरी निर्यात शुरू करने का पहला असली मौका देंगे, जो लंबे समय से व्यापार के लिए बीमारी-मुक्त होने की शर्त रखते आए हैं।

उन्होंने कहा कि बीमारी पर काबू बड़े पैमाने पर टीकाकरण और ‘ट्रेसिबिलिटी’ अभियान के जरिये पाया गया। सरकार ने 38 करोड़ जानवरों को 13 अंक वाले डिजिटल पहचान टैग जारी किए हैं और इस साल ओटीपी-आधारित जांच प्रणाली शुरू की गई है। अब किसानों को उनके फोन पर ‘वन-टाइम पासवर्ड’ (ओटीपी) मिलता है ताकि यह पक्का किया जा सके कि टीकाकरण हुआ है, क्योंकि कई राज्यों में बिना टीका लगाए ही टीकाकरण दर्ज करने के मामले सामने आए थे।

सिंह ने कहा कि आईसीएआर और पशुपालन विभाग ने मिलकर स्वदेशी टीके विकसित किए हैं, जो न सिर्फ एफएमडी बल्कि क्लासिकल स्वाइन फीवर (सीएसएफ) और पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (पीपीआर) को नियंत्रित करने में भी मदद कर रहे हैं।

बृहस्पतिवार के कार्यक्रम में देश में विकसित अफ़्रीकी स्वाइन फीवर का टीका भी पेश किया गया।

अमेरिका द्वारा आयात शुल्क बढ़ाने के झटके से मछली निर्यात के उबरने पर मंत्री ने कहा कि वर्ष 2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए 58 प्रतिशत शुल्क का शुरुआती असर उन निर्यातकों पर पड़ा जो भारत के सबसे बड़े समुद्री खाद्य बाजार, अमेरिका पर निर्भर थे। इसके बावजूद, वर्ष 2025-26 में निर्यात बढ़कर 73,891 करोड़ रुपये का हो गया, जो पिछले साल 62,408 करोड़ रुपये था।

मंत्री ने एक ऐसी कमी की ओर इशारा किया जिसे नीति के जरिये अभी दूर किया जाना बाकी है। देश के भीतर के जल स्रोतों में मछली पालन, जहां वर्ष 2014 के बाद से उत्पादन में 147 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है, देश के कुल मछली निर्यात में इसकी हिस्सेदारी मुश्किल से दो प्रतिशत है। उन्होंने देश के भीतरी स्रोतों से मछलीपालन (इनलैंड फिशरीज) से होने वाले उत्पादन को निर्यात के लिए बाहर भेजने को विशेष नीतिगत समर्थन – जिसमें ड्रोन-आधारित परिवहन भी शामिल है – की आवश्यकता पर जोर दिया।

सिंह ने आईसीएआर से कम इस्तेमाल हो रहे संसाधनों पर ध्यान देने को भी कहा और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे राज्य सरकार के साथ मिलकर ओडिशा में खारे पानी (ब्रैकिश वॉटर) के संसाधनों के विकास की रणनीति तैयार करें।

उन्होंने बताया कि ओडिशा में देश का सबसे बड़ा खारे पानी का क्षेत्र मौजूद है, जो ‘झींगा पालन के लिए एक बेहतरीन इलाका है। यह भारत का निर्यात के जरिये सबसे अधिक कमाई वाल समुद्री उत्पादों में से है।

वित्तपोषण के बारे में सिंह ने कहा कि आईसीएआर को ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ के तहत बीमारी नियंत्रण, एक्वाकल्चर और नस्ल सुधार पर शोध के लिए 123 करोड़ रुपये मिले हैं। उन्होंने एजेंसी को निर्देश दिया कि वह अपने ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ नेटवर्क का इस्तेमाल करके इस शोध को सीधे किसानों तक पहुंचाए।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय


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