अमेरिका-ईरान शांति समझौता क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाएगा, निर्यातकों को फायदा: सीआरएफ

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अमेरिका-ईरान शांति समझौता क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाएगा, निर्यातकों को फायदा: सीआरएफ

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  • Publish Date - June 16, 2026 / 01:09 PM IST,
    Updated On - June 16, 2026 / 01:09 PM IST

नयी दिल्ली, 16 जून (भाषा) अमेरिका-ईरान के बीच स्थायी शांति समझौता क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देगा। इससे मालभाड़ा, बीमा व लॉजिस्टिक्स लागत में कमी से भारतीय निर्यातकों को मदद मिलेगी और व्यापार के लिए अधिक विश्वसनीय माहौल मिलेगा। शोध संस्थान चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) ने मंगलवार को यह बात कही।

चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा कि एक टिकाऊ अमेरिका-ईरान शांति समझौते में पश्चिम एशिया में व्यापार और निवेश माहौल को उल्लेखनीय रूप से बेहतर बनाने की क्षमता है, क्योंकि इससे क्षेत्र के प्रमुख भू-राजनीतिक जोखिमों में से एक कम होगा।

उन्होंने कहा, ‘‘ भारत के लिए लाभ केवल ऊर्जा कीमतों की अस्थिरता में कमी तक सीमित नहीं हैं। अधिक क्षेत्रीय स्थिरता से शिपिंग में भरोसा बढ़ेगा, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईसी) जैसी संपर्क पहलों को मजबूती मिलेगी और खाड़ी तथा व्यापक पश्चिम एशिया के साथ व्यापार के लिए अधिक विश्वसनीय माहौल तैयार होगा।’’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान ने 107 दिन के युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौता कर लिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुसार इस शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने वाले हैं।

प्रियदर्शी ने कहा कि यह समझौता महत्वपूर्ण है क्योंकि भू-राजनीतिक स्थिरता व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

भारत, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, इटली, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अमेरिका के नेताओं ने नौ सितंबर 2023 को जी20 नेताओं के शिखर सम्मेलन के दौरान एक समझौता ज्ञापन की घोषणा की थी। इसमें नए आईएमईसी के विकास के लिए साथ काम करने की प्रतिबद्धता जताई गई है।

आईएमईसी में दो अलग-अलग गलियारे होंगे। पूर्वी गलियारा भारत को खाड़ी से जोड़ेगा और उत्तरी गलियारा खाड़ी को यूरोप से जोड़ेगा।

अमेरिका-ईरान संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये जहाजों की आवाजाही को गंभीर रूप से बाधित कर दिया है। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकीर्ण समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति/परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर जैसे प्रमुख खाड़ी उत्पादकों के लिए मुख्य निर्यात मार्ग है जो भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी हैं।

फरवरी के अंत में ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने के बाद इस जलडमरूमध्य से कच्चे तेल (जिससे पेट्रोल और डीजल बनते हैं) और प्राकृतिक गैस (जिसका उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, सीएनजी एवं घरेलू रसोई गैस के रूप में होता है) की आपूर्ति प्रभावित हुई थी। इससे कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग बीमा प्रीमियम और मालभाड़ा दरों में तेज बढ़ोतरी हुई।

इस क्षेत्र के प्रमुख देशों में छह जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषद) देश बहरीन, ओमान, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब के अलावा इज़राइल, ईरान, इराक, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया तथा यमन शामिल हैं।

वित्त वर्ष 2025-26 में जीसीसी देशों को भारत का निर्यात सालाना आधार पर दो प्रतिशत घटकर 55.71 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 56.87 अरब अमेरिकी डॉलर था।

देश का अन्य सात पश्चिम एशियाई देशों को निर्यात गत वित्त वर्ष में दो प्रतिशत बढ़कर 12.61 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो 2024-25 में लगभग 13 अरब अमेरिकी डॉलर था।

वहीं, 2025-26 में जीसीसी समूह से भारत का आयात सालाना आधार पर एक प्रतिशत बढ़कर 123 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जबकि 2024-25 में यह 121.7 अरब अमेरिकी डॉलर था। हालांकि, पश्चिम एशिया के अन्य सात देशों से आयात 12.94 प्रतिशत घटकर 28.71 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया, जो 2024-25 में 32.98 अरब अमेरिकी डॉलर था।

भाषा निहारिका

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