झीरम घाटी मामले में अदालत के आदेश में माओवादी साजिश की खौफनाक जानकारियों का जिक्र

झीरम घाटी मामले में अदालत के आदेश में माओवादी साजिश की खौफनाक जानकारियों का जिक्र

झीरम घाटी मामले में अदालत के आदेश में माओवादी साजिश की खौफनाक जानकारियों का जिक्र
Modified Date: September 18, 2026 / 10:04 pm IST
Published Date: September 18, 2026 10:04 pm IST

रायपुर, 18 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की जांच में सामने आया है कि माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में 2013 के घातक झीरम घाटी हमले की योजना करीब तीन महीने पहले ही बना ली थी और उन्होंने सुकमा-जगदलपुर राजमार्ग की रेकी की, घात लगाने के लिए जगह तय की और हमले से कुछ दिन पहले इसका अभ्यास भी किया था।

जांच से जुड़ी ये जानकारियां जगदलपुर में एनआईए की विशेष अदालत ने अपने आदेश में दीं। अदालत ने बुधवार को इस मामले में 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। यह आदेश शुक्रवार को अपलोड किया गया।

जांच के अनुसार माओवादियों ने सुकमा-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का सर्वे किया, घात लगाकर हमला करने की जगह चुनी और 25 मई, 2013 को हुए हमले से कुछ दिन पहले रिहर्सल भी की।

जांच में पता चला कि माओवादियों ने 16 से 25 फरवरी, 2013 के बीच अपनी ‘साउथ रीजनल यूनिफाइड कमांड’ की बैठक में इस हमले की योजना बनाई थी। अभियान को अंजाम देने के लिए उन्होंने अलग-अलग मिलिट्री इकाई और स्थानीय माओवादी सदस्यों को मिलाकर एक दल का गठन किया था।

दोषी ठहराए गए लोगों में प्रमिला मोड़ियाम (25), चैतू लेकाम (25), सुमित्रा पुनेम उर्फ आयती मोड़ियाम (40), मुक्का मंडावी (40), कवासी कोसा (30), आयता मड़काम (35), मडकामी देवा (35), जोगा मडकामी (35), बंजामी सन्ना (35) और महादेव नाग (28) शामिल हैं।

इस मामले में फरार 27 आरोपियों में माओवादी नेता थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी और बरसे सुक्का उर्फ देवा भी शामिल हैं, जिन्होंने तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर दिया है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एनआईए की जांच में पाया गया कि दरभा डिविजनल कमेटी के तत्कालीन सदस्य बरसे सुक्का उर्फ देवा को अभियान की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जबकि अन्य माओवादी सदस्यों को दरभा इलाके में पहुंचकर योजना के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

सुकमा से जगदलपुर जा रही कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ पर 25 मई, 2013 को हुए हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं समेत 27 लोगों की मौत हो गई थी और उस समय राज्य में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व लगभग समाप्त हो गया था। मारे गए लोगों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार शामिल थे।

अदालत के आदेश में कहा गया है कि सबूतों से यह साबित होता है कि माओवादियों ने हमले की योजना पहले ही बना ली थी, जगह चुनी थी, रेकी की थी और हमले को अंजाम देने से पहले रिहर्सल भी की थी।

अदालत ने कहा, ‘इससे साफ पता चलता है कि यह घटना पहले से तय थी और जान-बूझकर की गई थी।’

घटनास्थल के ऊपर पहाड़ी पर मौजूद एक जगह से गोलीबारी की गई थी। पीड़ितों को बहुत करीब से गोली मारी गई थी, जबकि गाड़ियों पर गोलियों के करीब 206 निशान मिले थे।

शिकायतकर्ता और घायल गवाहों के बयानों से पता चलता है कि घटनास्थल पर माओवादी खास तौर पर सलवा जुडूम नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस नेता नंद कुमार पटेल और उनके रिश्तेदारों को ढूंढ रहे थे।

सबूतों से यह भी पता चलता है कि महेंद्र कर्मा ने समर्पण करने के बाद अपनी पहचान बताई और कहा कि वह महेंद्र कर्मा हैं, साथ ही हमलावरों से बेगुनाह लोगों को न मारने की गुजारिश की। इसके बावजूद, माओवादी उन्हें खींचकर पहाड़ी की ओर ले गए और बहुत करीब से गोली मार दी। उन्होंने उनके सिर पर पत्थर भी मारे।

आरोप है कि उन्हें मारने के बाद माओवादियों ने उनकी लाश के पास नृत्य कर जश्न मनाया और मौत के बाद भी चाकू से उनके शरीर पर और चोटें पहुंचाईं। अदालत ने कहा कि मेडिकल गवाहों के बयानों से इन तथ्यों की पुष्टि हुई है।

अदालत के आदेश के मुताबिक, पोस्टमार्टम में कर्मा के शरीर पर कम से कम 69 घाव पाए गए।

अदालत ने पाया कि यह मामला ‘दुर्लभ’ की श्रेणी में आता है।

आदेश में कहा गया है कि एनआईए की जांच में पता चला कि छत्तीसगढ़ में माओवादी संगठन का ढांचा तथाकथित दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) के तहत काम करता था, जबकि झीरम घाटी का इलाका साउथ रीजनल यूनिफाइड कमांड की दरभा डिविजनल कमेटी के अधिकार क्षेत्र में आता था।

एनआईए के मुताबिक, तैयारियों के हिस्से के तौर पर कांगेर घाटी क्षेत्रीय समिति के सदस्यों (जिनमें सोनाधर भी शामिल था) और तीन अन्य आरोपियों — सुमित्रा, महादेव नाग और मुक्का मांडवी (ये तीनों दोषी ठहराए जा चुके हैं) — ने जन मिलिशिया सदस्यों, संघम सदस्यों और अन्य साथियों के साथ कई बैठकें कीं।

इन बैठकों में झीरम घाटी इलाके में इकट्ठा होने वाले बड़ी संख्या में माओवादियों के लिए खाने, रहने और साजो-सामान का इंतजाम करने पर ध्यान दिया गया।

कोलेंग गांव से चावल की लगभग 25 बोरियां (हर एक का वजन करीब 50 किलो) इकट्ठा की गईं और उन्हें कांदनार में आरोपी महादेव नाग के घर पर रखा गया। जांच के अनुसार, 23 मई को यह सामान माओवादी कैडरों को सौंप दिया गया, जबकि कुछ ग्रामीणों को खाना बनाने, जलावन की लकड़ी इकट्ठा करने और साजो—सामान से जुड़े अन्य काम करने के लिए वहीं रोक लिया गया।

माओवादी नेताओं ने सुकमा-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का भी जायजा लिया और हमले के लिए झीरम घाटी में एक सही जगह चुनी। घटना से छह-सात दिन पहले नेताओं की देखरेख में एक्कम-चकपाल के पास एक जंगल में रिहर्सल भी की गई।

आदेश में कहा गया है कि इसमें देवा और विनोद भी शामिल थे। 22 और 23 मई की रात को, लगभग 100 माओवादियों के एक हथियारबंद समूह ने कांगेर घाटी इलाके के जन मिलिशिया सदस्यों के साथ मिलकर सड़क के दोनों ओर अस्थायी कमांड सेंटर बनाए।

एनआईए के अनुसार, इन माओवादियों के पास एके-सीरीज की राइफलें, एसएलआर, एलएमजी, .303 राइफलें, हथगोला और देसी हथियार थे।

माओवादियों को पता था कि कांग्रेस नेता, जिनमें महेंद्र कर्मा भी शामिल थे, परिवर्तन यात्रा का हिस्सा होंगे। कर्मा, जो सलवा जुडूम माओवादी-विरोधी अभियान के एक प्रमुख नेता थे, लंबे समय से माओवादी संगठन के निशाने पर थे।

पच्चीस मई को शाम करीब चार बजे, जब कांग्रेस का काफिला तोगपाल से गुजरा और झीरम घाटी से लगभग 13 किमी आगे पहुंचा, तब एक धमाका हुआ और माओवादियों ने दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू कर दी। हमले में लगभग 150-200 माओवादी सदस्य शामिल थे, जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों थे।

एनआईए की जांच में पता चला कि हमले के दौरान नौ एके-47 राइफलें, सात इंसास राइफलें, चार 9-एमएम पिस्तौलें और दो एसएलआर भी लूट ली गईं।

जांच में पता चला कि गोलीबारी कुछ देर के लिए रुकने के बाद, माओवादी नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश, उनके वाहन चालक दशाराम सिदार और तत्कालीन कांग्रेस विधायक कवासी लखमा को घने जंगल वाले इलाके में ले गए।

लखमा ने जांचकर्ताओं को बताया कि माओवादियों ने समूह को घेर लिया और उनसे उनकी पहचान के बारे में पूछा। पटेल ने खुद को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बताया, जिसके बाद माओवादी नेता विनोद ने अन्य माओवादियों को पटेल और उनके बेटे को बांधने का निर्देश दिया। बाद में लखमा और वाहन चालक को जाने के लिए कहा गया।

वाहन चालक दशाराम ने गवाही दी कि लखमा शुरू में केशलूर जाने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन पटेल ने उनसे कहा कि उन्हें उनके साथ चलना होगा। यात्रा के दौरान, लखमा को बार-बार फोन आ रहे थे और वे गोंडी भाषा में बात कर रहे थे, जिसमें बार-बार ’10-15′ कहा जा रहा था।

जब पटेल ने उनसे हिंदी में बात करने और इसका मतलब समझाने के लिए कहा, तो लखमा ने ‘डीजल-डीजल’ कहा।

गवाह ने यह भी बताया कि घटनास्थल पर लखमा और माओवादी विनोद के बीच गोंडी भाषा में बातचीत हुई थी। लगभग एक घंटे बाद, पटेल और दिनेश के हाथ बांधकर उन्हें पीछे से गोली मार दी गई। इसके बाद लखमा और वाहन चालक मोटरसाइकिल से दरभा पुलिस स्टेशन गए।

अदालत के आदेश में कर्मा की हत्या से जुड़े सबूत भी दर्ज हैं। माओवादियों के सामने कर्मा के समर्पण करने के बाद गोलीबारी कुछ देर के लिए रुक गई थी। उन्होंने अपनी पहचान बताई और हमलावरों से बेगुनाह लोगों को न मारने की अपील की। इसके बावजूद, आरोप है कि माओवादी उन्हें खींचकर पहाड़ी की ओर ले गए और बहुत करीब से गोली मार दी।

यह मामला शुरू में दरभा पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड सहिंता, शस्त्र अधिनिमय, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था, लेकिन घटना के दो दिन बाद इसे एनआईए को सौंप दिया गया। भाषा संजीव शोभना

शोभना


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