बंदूक से विकास के पथ तक का सफर: कांकेर पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादी पुन: अपनी जिंदगी गढ़ रहे
बंदूक से विकास के पथ तक का सफर: कांकेर पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादी पुन: अपनी जिंदगी गढ़ रहे
(टिकेश्वर पटेल)
रायपुर, 11 फरवरी (भाषा) छत्तीसगढ़ में उग्रवाद प्रभावित कांकेर जिले के एक सुदूर इलाके में, जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं, वे अब चुपचाप वाहन चलाना, कपड़े सिलना और लकड़ी तराशना सीख रहे हैं।
जंगलों में वर्षों बिताने के बाद ये लोग नक्सली हिंसा का मार्ग छोड़कर अब नया जीवन जी रहे हैं।
राज्य सरकार ने पूर्व माओवादियों को सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन की ओर मोड़ने का प्रयास किया है, जिसके तहत, कांकेर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर चौगेल (मुल्ला) गांव में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) शिविर के परिसर में स्थापित एक पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पण करने वाले 40 नक्सलियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिनमें 19 महिलाएं शामिल हैं।
पुनर्वास केंद्र के नोडल अधिकारी विनोद अहिरवार ने बुधवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि छत्तीसगढ़ नक्सली आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति के तहत, माओवादी गतिविधियों में शामिल रहे पुरुषों और महिलाओं को अब गाड़ी चलाने, सिलाई, लकड़ी का काम और सहायक इलेक्ट्रीशियन जैसे व्यवसायों में प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे आजीविका कमा सकें और पुन: मुख्यधारा का हिस्सा बन सकें।
उन्होंने बताया कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को बुनियादी शिक्षा भी दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि इस केंद्र की स्थापना पिछले साल नवंबर में हुई थी, जिसमें आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों एवं माओवादी हिंसा के शिकार लोगों को प्रशिक्षुओं के रूप में भर्ती किया गया था।
अहिरवार ने बताया कि इनमें से 12 ने अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया है, जबकि 14 अन्य को उनके संबंधित गृह जिलों के पुनर्वास केंद्रों में भेज दिया गया है।
फिलहाल, आत्मसमर्पण करने वाले 40 माओवादियों को 20-20 के दो बैच में प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
नोडल अधिकारी ने बताया कि फिलहाल प्रशिक्षुओं को चारपहिया और दोपहिया वाहन चलाना, सिलाई, लकड़ी का काम और सहायक इलेक्ट्रीशियन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मशरूम की खेती, बागवानी और अन्य स्वरोजगार-उन्मुख गतिविधियों में अतिरिक्त पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना पर काम चल रहा है।
उन्होंने कहा कि व्यावसायिक प्रशिक्षण के साथ-साथ, प्राथमिक स्तर (पहली से आठवीं तक) की कक्षाएं व्यक्तिगत आवश्यकताओं के आधार पर संचालित की जा रही हैं।
नोडल अधिकारी के अनुसार, पूर्व नक्सली शिक्षा में गहरी रुचि दिखा रहे हैं और अपना भविष्य संवारने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
इन पूर्व नक्सलियों में एक मान्हेर तरम (40) ने कहा, ‘‘गाड़ी चलाना सीखने की मेरी लंबे समय से चली आ रही इच्छा अब पूरी हो रही है।’’
अन्य प्रशिक्षु, नरसिंह नेताम ने आशा व्यक्त की कि वह जो नए कौशल सीख रहा है, उससे उसे भविष्य में एक स्थिर और बेहतर जीवन बनाने में मदद मिलेगी।
भाषा
राजकुमार सुरेश
सुरेश

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