Padma Shri Award 2026: वर्षों तक बस्तर के जंगलों में करते रहे सेवा, बदल दी हजारों जिंदगियां, आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी सम्मानित

Padma Shri Award 2026: वर्षों तक बस्तर के जंगलों में करते रहे सेवा, बदल दी हजारों जिंदगियां, आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी सम्मानित

Padma Shri Award 2026: वर्षों तक बस्तर के जंगलों में करते रहे सेवा, बदल दी हजारों जिंदगियां, आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी सम्मानित

Padma Shri Award 2026 | Photo Credit: AI

Modified Date: May 25, 2026 / 10:41 am IST
Published Date: May 25, 2026 10:40 am IST
HIGHLIGHTS
  • डॉ. बुधरी ताती को पद्म श्री
  • गोडबोले दंपत्ति को पद्म श्री
  • पद्म पुरस्कार बने ‘पीपल्स पद्म’

रायपुर: Padma Shri Award 2026 भारतीय गणराज्य की गौरवशाली परंपरा में सोमवार एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित भव्य नागरिक अलंकरण समारोह में भारत की माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू देश के उन अनमोल रत्नों को ‘पद्म पुरस्कार’ (Padma Shri Award 2026) से अलंकृत करेंगी, जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार की इच्छा के समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोगों के जीवन को बदलने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। (Padma Awards News)

Padma Shri Award 2026 हाल के वर्षों में देश ने पद्म पुरस्कारों के स्वरूप को बदलते और इन्हें वास्तव में ‘पीपल्स पद्म’ (जनता का पद्म) बनते देखा है। पहले जहाँ ये सम्मान महानगरों की चकाचौंध, रसूखदारों और सत्ता के गलियारों तक सीमित माने जाते थे, वहीं अब ये पुरस्कार सुदूर जंगलों, दुर्गम पहाड़ों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जनजातीय बस्तियों के उन साधकों तक पहुँच रहे हैं, जिन्होंने कभी किसी सम्मान की कामना ही नहीं की। (Tribal Area Social Service)

इसी कड़ी में कल का दिन विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के जनजातीय समाज के लिए गौरव का अवसर बनने जा रहा है। बस्तर संभाग के सुदूर, दुर्गम और नक्सल प्रभावित वनांचलों में स्वास्थ्य सेवा, कुपोषण के खिलाफ संघर्ष, बालिका शिक्षा, नशामुक्ति और महिला सशक्तीकरण की अलख जगाने वाले छत्तीसगढ़ के तीन महान समाजसेवियों-डॉ. बुधरी ताती (‘बड़ी दीदी’) तथा प्रख्यात समाजसेवी दंपत्ति डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले-को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया जाएगा। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्यों इन विभूतियों का सम्मान पूरे राष्ट्र और मानवता के लिए गौरव का विषय है।

डॉ. बुधरी ताती (‘बड़ी दीदी’): 500 गाँवों तक पैदल पहुँचकर सामाजिक परिवर्तन की अलख जगाने वाली महानायिका

छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर स्थित दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गाँव की रहने वाली डॉ. बुधरी ताती को बस्तर अंचल का जनजातीय समाज अत्यंत सम्मान और स्नेह के साथ ‘बड़ी दीदी’ कहकर पुकारता है। पिछले चार दशकों से अधिक समय से वे सुदूर वनांचलों में वनवासी कल्याण, बालिका शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के लिए अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं। इसी मूक साधना और समाजसेवा के लिए उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया जा रहा है।

जब रास्ते नहीं थे, तब बनीं सहारा

डॉ. बुधरी ताती की सेवा यात्रा वर्ष 1984 में शुरू हुई थी, जब बस्तर के घने जंगलों में न सड़कें थीं, न मोबाइल नेटवर्क और न ही बुनियादी सुविधाएँ। उस दौर में आदिवासी समाज के बीच जाकर उनका विश्वास जीतना किसी चुनौती से कम नहीं था।

‘बड़ी दीदी’ ने अबूझमाड़ और दंतेवाड़ा के नक्सल प्रभावित घने जंगलों के बीच सैकड़ों गाँवों की पैदल यात्राएँ कीं। उस समय वनवासी परिवार पूरी तरह वनोपज और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थे, जिसके कारण बच्चों की शिक्षा उपेक्षित रह जाती थी। बुधरी ताती ने माता-पिता को धैर्यपूर्वक समझाया कि शिक्षा ही उनके बच्चों के भविष्य को बदल सकती है और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ सकती है।

महिला सशक्तीकरण की नई इबारत

‘बड़ी दीदी’ ने केवल बच्चों को स्कूल भेजने तक अपना कार्य सीमित नहीं रखा, बल्कि आदिवासी महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किए।उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई एवं हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए। उनके प्रयासों से अनेक आदिवासी महिलाएँ आत्मनिर्भर बनकर अपने पैरों पर खड़ी हुईं। उनकी प्रेरणा से कई आदिवासी बेटियाँ आज विभिन्न अस्पतालों में नर्स के रूप में कार्यरत हैं। कुपोषण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान

मारिया और मुरिया जनजातीय समुदायों के बीच कार्य करते हुए उन्होंने देखा कि जागरूकता के अभाव में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर अत्यधिक थी। डॉ. बुधरी ताती ने पारंपरिक जनजातीय ज्ञान और आधुनिक स्वास्थ्य पद्धतियों के समन्वय से स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने का कार्य किया।

इसके साथ ही उन्होंने शराबखोरी, घरेलू हिंसा और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी व्यापक अभियान चलाया। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ उनका यह प्रयास आज बस्तर के सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बन चुका है।

डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले: बस्तर के जंगलों में सेवा और समर्पण की मिसाल

जब समर्पण और मानवता की बात होती है, तब ‘युगल श्रेणी’ में दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों का महत्व और बढ़ जाता है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचलों में चिकित्सा एवं सामाजिक सेवा की नई परिभाषा गढ़ने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले को संयुक्त रूप से ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया जा रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा का कठिन सफर

बस्तर संभाग दशकों से नक्सली हिंसा और भौगोलिक दुर्गमता की चुनौतियों से जूझता रहा है। ऐसे समय में, जब मुख्यधारा के डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता इन क्षेत्रों में जाने से कतराते थे, तब गोडबोले दंपत्ति ने अबूझमाड़ और आसपास के दुर्गम इलाकों को अपनी कर्मभूमि बनाया।

उन्होंने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष आदिवासी क्षेत्रों की सेवा में समर्पित कर दिए। उनका उद्देश्य था कि स्वास्थ्य सेवाएँ उन लोगों तक पहुँचें, जिनकी आधुनिक चिकित्सा तक पहुँच लगभग न के बराबर थी।

कुपोषण और शिशु स्वास्थ्य के खिलाफ संघर्ष

आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी, जागरूकता की कमी और अंधविश्वास के कारण बच्चों में कुपोषण गंभीर समस्या बना हुआ था। गोडबोले दंपत्ति ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रयास किए—

1. कुपोषित बच्चों की पहचान कर स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार योजनाओं को बढ़ावा दिया।

2. दुर्गम गाँवों में नियमित स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए।

3. आदिवासियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर उन्हें आधुनिक चिकित्सा प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया।

मानवीय सेवा का व्यापक स्वरूप

गोडबोले दंपत्ति का कार्य केवल दवाइयाँ बाँटने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आदिवासी समाज के समग्र कल्याण, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक उत्थान के लिए निरंतर कार्य किया। उन्होंने युवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य तकनीकों का प्रशिक्षण देकर ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया।

उनकी निस्वार्थ सेवा के कारण बस्तर के अनेक आदिवासी उन्हें आज भी अत्यंत सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।

‘पीपल्स पद्म’: पुरस्कार व्यवस्था में बदलाव की नई तस्वीर

नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह समारोह इस बात का प्रमाण है कि पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया अब अधिक लोकतांत्रिक और जन-केंद्रित हुई है।

अब देश का कोई भी नागरिक ऑनलाइन माध्यम से किसी गुमनाम नायक का नामांकन कर सकता है।

चयन प्रक्रिया में प्रसिद्धि या राजनीतिक प्रभाव के बजाय जमीनी कार्य और सामाजिक प्रभाव को प्राथमिकता दी जा रही है।

महानगरों से आगे बढ़कर अब बस्तर, अबूझमाड़ और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को भी राष्ट्रीय पहचान मिल रही है।

इस वर्ष घोषित कुल 131 पद्म पुरस्कारों में 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं, जो भारत की विविध प्रतिभाओं और सेवाभावी व्यक्तित्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

कल जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं डॉ. बुधरी ताती और गोडबोले दंपत्ति को पद्म श्री प्रदान करेंगी, तब वह केवल एक पुरस्कार वितरण समारोह नहीं होगा, बल्कि उसका गहरा सामाजिक और प्रतीकात्मक महत्व भी होगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं जनजातीय पृष्ठभूमि से आती हैं और उन्होंने जीवन में संघर्ष तथा अभावों को निकट से देखा है। ऐसे में उनके हाथों से वनांचलों में कार्य करने वाले इन समाजसेवियों को सम्मान मिलना विशेष रूप से प्रेरणादायक माना जा रहा है।

यह सम्मान इस बात का भी संदेश है कि देश अब बस्तर जैसे क्षेत्रों को केवल संघर्ष और हिंसा के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और सामाजिक परिवर्तन की भूमि के रूप में भी पहचान रहा है।

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लेखक के बारे में

IBC24 डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हूं, जहां मेरी जिम्मेदारी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति सहित प्रमुख विषयों की खबरों की कवरेज और प्रस्तुति है। वर्ष 2016 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हूं और अब तक 8 वर्षों का अनुभव प्राप्त किया है। विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए न्यूज़ राइटिंग और डिजिटल टूल्स में दक्षता हासिल की है। मेरे लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है—सटीक, तेज और असरदार जानकारी पाठकों तक पहुंचाना मेरा लक्ष्य है। बदलते डिजिटल दौर में खुद को लगातार अपडेट कर, कंटेंट की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध हूं।