शह मात The Big Debate: गांवों का विधान ही संविधान! धर्म प्रचारकों की नो एंट्री पर सुप्रीम मुहर, क्या इस निर्णय से धर्मांतरण में आ रही कमी?
गांवों का विधान ही संविधान! धर्म प्रचारकों की नो एंट्री पर सुप्रीम मुहर, Supreme Court seals no entry for religious preachers
रायपुरः CG News धर्मांतरण रोकने ग्राम पंचायतों के फैसले को सुप्रीम अदालत तक ले जाया गया, जहां से आदिवासी इलाकों में ग्राम सभाओं के फैसले को सही बताया गया। ग्रामीण-सरकार सभी ने फैसले का स्वागत करते हुए खुशी जताई, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने इस पर कुछ सवाल उठाए हैं। विपक्ष के अल्पसंख्यक प्रदेश प्रभारी ने तो प्रदेश में हालत की तुलना बांग्लादेश से कर दी है। क्या वाकई ये तुलना बनती है? क्या दूर-दूर तक ऐसे कोई हालत प्रदेश में कहीं भी हैं?
CG News बस्तर में पांचवी अनुसूची क्षेत्र में बाहरी पास्टर-पादरी-धर्म प्रचारकों के प्रवेश-निषेध वाले बोर्ड पर सु्प्रीम फैसला आने पर बीजेपी नेताओं ने खुले मन से इसका स्वागत किया। दरअसल छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल वनांचल हिस्सों में बढते धर्मांतरण से वर्ग संघर्ष के हालात बनने लगे, जिससे बचाव के लिए, कांकेर ज़िले में ग्राम पंचायतों ने गांव में बाहरी धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक वाले बोर्ड लगा दिए। संबंधित पक्षों ने बोर्ड्स के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका लगाई, जहां पेसा कानून का हवाला देते हुए कोर्ट ने ग्राम सभाओं के फैसले को वैध बताया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपील खारिज करते हुए दोहराया कि पेसा कानून के अंतर्गत ग्राम सभाएं अपने सामाजिक-सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े विषयों पर निर्णय ले सकती हैं। फैसले का ग्राम सभा पदाधिकारी और ग्रामीणों के साथ-साथ सरकार ने भी स्वागत किया। प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने दावा किया कि प्रदेश सरकार पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पेसा नियमों को अधिक प्रभावी बनाने काम कर रही है।
मुद्दे पर सियासी रंग भी चढ़ता दिखा। कांग्रेस का आरोप है कि ये बीजेपी का सियासी हथियार है। देश में हर व्यक्ति को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है। कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रदेश प्रभारी डॉ अमीनुल खान सूरी ने तो छत्तीसगढ़ की तुलना बांग्लादेश से हो कर दी। अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के आरोप लगाए। जबाव में भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने चैलेंज करते हुए कहा मेरे निर्वाचन क्षेत्र में लाइट-माइक-टेंट की व्यवस्था दूंगा, पास्टर-पादरी खुले तौर पर व्याख्यान दें, लेकिन अशिक्षित वर्ग के बीच चोरी छुपे जाकर धर्म का प्रचार क्यों करते हैं? साफ है कि छत्तीसगढ़ में बढते धर्मांतरण से वर्ग संघर्ष और संस्कृति पर प्रहार से बचने ग्राम सभाओं ने खुद ही प्रचार पर लगाम कसने ये बोर्ड लगाए। मुद्दे पर सर्व समाज आक्रोश प्रकट कर सड़कों पर आ चुका है। देश की सुप्रीम अदालत ने भी इसे पूरी तरह वैध करार दिया है। ग्रामीणों ने इसे सही बताकर स्वागत किया है ऐसे में प्रदेश में अल्पसंख्यकों से अन्याय मामले में बांग्लादेश से तुलना करना कितना सही है?
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