25 जून लोकतंत्र का काला दिन, इमरजेंसी हटने के बाद कैसे रहे हालात, पूर्व कैबिनेट मंत्री ने साझा किया अनुभव
25 जून लोकतंत्र का काला दिन, इमरजेंसी हटने के बाद कैसे रहे हालात, पूर्व कैबिनेट मंत्री ने साझा किया अनुभव
रायपुर। छत्तीसगढ़ में जनसंघ के डॉक्टर केशव सिंह ठाकुर जो प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता एवं विख्यात चिकित्सक तथा लोचन साहू के साथ साथ शासकिय विज्ञान महाविद्यालय रायपुर के हमारे छात्र नेता ओपी शर्मा और अश्विनी दुबे , प्रकाश शुक्ला की गिरफ्तारी हो चुकी थी । शुभ चिंतकों द्वारा मेरी आंदोलनात्मक सक्रियता को देखते हुए भूमिगत होने की सलाह मिली , उस सम लेवि किसान आंदोलन एवं जयप्रकाश आंदोलन से जुड़ा हुआ था, देश कंसाथ साथ निजी जीवन मे भी आपातकाल के बादल गहराने लगे मैने सन्यासी भेष में पवन दिवान के आश्रम में शरण ली, छत्तीसगढ़ में आंदोलन हम नवयुवाओं के कंधों पर आ गया था, एबीवीपी सहित अन्य गैरकांग्रेसी छात्र संगठन भूमिगत होकर कार्य करने लगे, सुहास राजिमवाले, बब्बन जी मिश्र, महेंद्र दुबे, बसन्त दुबे आदि पत्रकार साथियों के साथ भूमिगत आंदोलन में मेरी भी सक्रियता बनी रही ।
पढ़ें- चीन ने भारतीय सीमा के करीब शुरू किया बुलेट ट्रेन, 4…
महज़ 28 साल हुए थे देश को आजाद हुए और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाही फैसले के कारण आपातकाल लागू हो गया, जब देश लोकतंत्र की गोद मे निश्चिंतता से सो रहा था 25-26 जून की उस रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर के साथ ही देश में आपातकाल लागू कर दिया गया जिसने देश के लोकतंत्र सहित इंदिरागांधी की कांग्रेस के विरोधी हर स्वर को कुचलने के लिए दमन का सरकारी माहौल तैयार किया ।
पढ़ें- खाद्य नियंत्रक की आईडी हैक कर बना डाला 185 फर्जी रा…
1971 के लोकसभा चुनाव में मती इंदिरा गांधी ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को पराजित किया था। परंतु चुनाव परिणाम निकलने के चार साल बाद राजनारायण द्वारा हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी गई । 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त करते हुए उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। इसके साथ ही मती इंदिरा गांधी के चिर प्रतिद्वंद्वी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया गया।
राजनारायण सिंह के अनुसार इंदिरा गांधी द्वारा चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया गया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया गया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया , हालाँकि मती गांधी द्वारा इस्तीफा देने से इंकार कर दिया गया था। इसी समय गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरूद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली थी। इंदिरा के पद नहीं छोड़ने की स्थिति में अगले दिन 25 जून को जेपी ने अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था, दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्ति-‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,’ का उद्घोष किया था । इस दोहरी हार और गैरकांग्रेसी राजनैतिक शक्तियों के उदय से इंदिरा गांधी इतनी असहज हो गई थी कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा करते हुए 26 जून को आपातकाल लागू कर दिया। आपातकाल लागू करने की वजह अनियंत्रित आंतरिक स्थितियाँ बताई गई।
पढ़ें- बुजुर्ग दंपति सहित पोती की पत्थर से कुचलकर हत्या, ट…
जिन प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी हुई उनमें जय प्रकाश, नाना जी देशमुख अटल बिहारी वायपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, रामकृष्ण हेगड़े, जॉर्ज फर्नांडिस, मोरारजी देसाई , सुब्रमण्यम स्वामी, एचडी देवेगौड़ा, एम करुणानिधि, जेबी पटनायक, ज्योति बसु, मधु दंडवते, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव आदि थे । जयप्रकाश तथा उनके आंदोलन पर युग धर्म पत्रिका मे मैंने एक लेख लिखा था जो उस समय के वरिष्ठ आंदोलनकारियों द्वारा प्रशंसा का पात्र बना, लेख का विषय ग्रामीण युवाओं को आंदोलन से जोड़ने की योजना पर आधारित था ।
पढ़ें- Windows-11 new features 2021 : विंडोज-11 लॉन्च, अब आ गया नया डिजाइन…
गैरसरकारी इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों के अभाव में समाचार पत्र ही मीडिया के रूप में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्तम्भ बने हुए थे तथा उस समय अखबारों का जनमानस पर बहुत गहरा प्रभाव था, इस लिए इंदिरा सरकार ने समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू की समाचार भेजने पर भी रोक लग गई । तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री गुजराल का तबादला योजना मंत्रालय कर दिया गया और रायपुर निवासी विद्याचरण शुक्ल भारत के नए सूचना और प्रसारण मंत्री बना दिए गए । सरकार द्वारा यह निर्देश आया कि समाचार पत्र जो भी समाचार भेजना चाहें उसे पहले सूचना विभाग को दें, यदि वहां से वह पास होता है तभी आगे उसे छपने भेज सकते हैं। विधानमंडल और संसद में जो बोला जाता था वह भी अखबारों को प्री सेंसर के लिए भेजना पड़ता था।
पढ़ें- Teacher student love story in hindi : ऑनलाइन क्लास के दौरान टीचर को…
राजधानी दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित अखबारों के ऑफिसेज की बिजली काट दी गई थी । राजनैतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ मीडिया जगत पर भी अनेक पाबंदियां और अत्याचार इस समय मे दर्ज हुए । आपातकाल के दौरान अप्रैल, 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने दिल्ली के तुर्कमान गेट पर बसी झोपड़ियों को गिराने का आदेश दिया। जब लोगों ने विरोध किया तो पुलिस ने गोलियां चलाईं जिसमें कई लोगों की जान गई। देश के लोगों को इस घटना के बारे में विदेशी मीडिया के द्वारा पता चला ।
पढ़ें- 12th results Release date 2021 : 31 जुलाई तक 12वीं के परिणाम होंगे …
भाजपा के लौहपुरुष और मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी जी ने आपात काल के बाद भी आपातकाल की इन प्रवृत्तियों के मौजूद रहने और आपातकाल के भविष्य में भी लागू किए जाने की आशंकाओं की बात अकारण नहीं कही थी, उस इमरजेंसी के कामकाज के तौर-तरीक़े पूरी तरह से कभी ख़त्म नहीं हुए । आपातकाल का अंत 21 मार्च 1977 को हुआ था जिसे लोकतंत्र की जीत की तरह से मनाया जाता है । वर्ष 1977 में इमरजेंसी के हटने के पश्चात चुनावो में मुझे जनता पार्टी के साथियों के समर्थन से जनपद अध्यक्ष का सीधा चुनाव लड़ा ( उस समय अध्यक्ष पद के सीधे चुनाव की पद्धति थी ) , जिसका परिणाम सकारात्मक रहा और इस प्रकार से मेरे सक्रीय चुनावी राजनैतिक जीवन का आरंभ हुआ ।

Facebook


