नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) कांग्रेस ने मंगलवार को कहा कि मोदी सरकार में वर्ष 2019 से 2024 के बीच केवल 16 प्रतिशत विधेयकों को संसद की स्थायी समितियों के पास भेजा गया, जबकि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए वर्ष 2009 से 2014 के दौरान 71 प्रतिशत विधेयकों को इन समितियों के पास भेजा गया था।
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि लोकसभा और राज्यसभा में विपक्षी दलों ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 को संबंधित संसदीय स्थायी समिति (वित्त) के पास भेजने की मांग की है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस मांग को स्वीकार करेगी।
रमेश ने दावा किया, ‘‘वर्ष 2019 से 2024 के बीच केवल 16 प्रतिशत विधेयकों को ही संसदीय स्थायी समितियों के पास भेजा गया, जबकि वर्ष 2009 से 2014 के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 71 प्रतिशत विधेयकों को इन समितियों के पास भेजा गया था।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार की कार्यप्रणाली यह रही है कि जब किसी संसदीय स्थायी समिति की अध्यक्षता विपक्ष के सांसद के पास होती है तो संबंधित विधेयक को उसके पास भेजने के बजाय भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया जाता है।
कांग्रेस नेता ने दावा किया कि जैव विविधता संरक्षण और वन संरक्षण से जुड़े विधेयकों के मामले में ऐसा दो बार किया गया।
उन्होंने कहा कि इसका ताजा उदाहरण ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ है, जिसे जानबूझकर उस समय शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पास नहीं भेजा गया, जिसकी अध्यक्षता कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के पास थी, बल्कि इसे भाजपा के एक सांसद की अध्यक्षता वाली संयुक्त समिति को भेज दिया गया।
रमेश ने यह भी कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) और वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को भी भाजपा नेताओं कल्याण सिंह और सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता वाली संसदीय समितियों के पास भेजा गया था।
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