नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को गुरुग्राम की 436 बीघा से अधिक जमीन का स्वामित्व ग्राम पंचायत को बहाल कर दिया।
न्यायालय ने 2007 में जमीन पर निजी स्वामित्व के दावों को मान्यता देने वाले पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को भी खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गांव की सामुदायिक भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा, ‘‘भूमि को ‘नया सोना’ माना जाता है, खासकर तब जब ऐसी जमीन गुरुग्राम जैसे तेजी से विस्तार कर रहे शहरी क्षेत्रों के नजदीक हो।’’
पीठ की ओर से 85 पन्नों का फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि विवादित जमीन हरियाणा सामुदायिक भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961 के तहत ‘‘शामलात देह’’ (गांव की सामुदायिक भूमि) है।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने केवल इस आधार पर जमीन को निजी स्वामित्व वाली मानने में गलती कर दी कि राजस्व रिकॉर्ड में गांव के ‘पट्टेदारों’ के नाम दर्ज थे।
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा 24 अगस्त, 2007 को दिया गया विवादित साझा फैसला तथ्य और कानून, दोनों के आधार पर टिकाऊ नहीं है। अत: अपीलों को स्वीकार करते हुए उस फैसले को रद्द किया जाता है और 13 सितंबर, 1955 को वजीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में किए गए दाखिल खारिज को बरकरार रखा जाता है। यह आदेश गुरुग्राम नगर निगम के लिए प्रभावी रहेगा।’’
फैसले में कहा गया कि वादी 13 सितंबर, 1955 को वजीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में किए गए दाखिल-खारिज में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर सके।
यह विवाद वर्तमान गुरुग्राम में वजीराबाद से सटे हैदरपुर के गैर-आबादी वाले गांव की 436 बीघा और 18 बिस्वा जमीन से संबंधित था।
पंजाब ग्राम सामुदायिक भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1953 लागू होने के बाद वर्ष 1955 में इस जमीन का दाखिल-खारिज ग्राम पंचायत के पक्ष में किया गया था। कई दशक बाद, गांव के स्वामित्वधारी समूहों के माध्यम से दावा करने वाले कुछ लोगों ने इस दाखिल खारिज को चुनौती दी।
उन्होंने दलील दी कि यह जमीन निजी पट्टेदारों की थी और कभी भी पंचायत के अधिकार में नहीं आई।
पीठ ने कहा कि गांव की सामुदायिक भूमि का इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से सामूहिक उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है और स्वतंत्रता के बाद बनाए गए कानूनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ऐसी जमीनें गांव के निवासियों के हित में ग्राम पंचायतों के अधिकार में रहें।
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में केवल स्वामित्वधारियों के नाम दर्ज होने या ‘‘हिसब रसीद’’ जैसी प्रविष्टियां होने से पहले से ‘‘शामलात देह’’ के रूप में दर्ज जमीन का मूल स्वरूप नहीं बदल जाता।
न्यायालय ने वजीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में वर्ष 1955 में किए गए दाखिल-खारिज को बहाल कर दिया और विवादित जमीन पर पंचायत के स्वामित्व अधिकार को फिर से मान्यता दी।
भाषा जितेंद्र नरेश
नरेश