नई दिल्लीः Amit Shah on Naxalism in Parliament लोकसभा में देश को वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) से मुक्त करने के प्रयासों पर चर्चा हो रही है। इस चर्चा में हिस्सा लेते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि देश के अंदर अन्याय हो तो हथियार उठाना यह लोकतांत्रिक नहीं है। उन्होंने सदन के सामने आंकड़े रखते हुए कहा कि 70 के दशक में नक्सलबाड़ी से इसकी शुरुआत हुई और एक ही साल के अंदर 3620 हिंसा की घटनाएं हुईं। फिर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और ओडिशा में नक्सलवाद फैला। वामपंथी पार्टियों में विलय शुरू हुआ और 2004 में दो प्रमुख गुट मिल गए। इसी दौरान सीपीआई (माओवादी) का गठन किया। 70 से 2004 तक चार साल छोड़कर कांग्रेस की पार्टी सत्ता में रही।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वामपंथी उग्रवाद की विचारधारा पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह समझना जरूरी है कि इस विचारधारा का मूल क्या है और इसका ध्रुव वाक्य क्या है। गृहमंत्री ने कहा कि भारत ने आजादी के बाद “सत्यमेव जयते” को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया, जबकि नक्सल विचारधारा का आधार “सत्ता बंदूक की नली से निकलती है” जैसे सिद्धांत पर टिका है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह सोच हिंसा को बढ़ावा देती है।
अमित शाह ने कहा कि देश में कई लोग अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन भारत अब अंग्रेजों के शासनकाल में नहीं है, जहां सशस्त्र संघर्ष को जायज ठहराया जा सके। उन्होंने आदिवासी नायक बिरसा मुंडा का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी तुलना नक्सलियों से करना पूरी तरह गलत है, क्योंकि उन्होंने विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष किया था। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठें और एकजुट होकर देश से नक्सलवाद को समाप्त करने की दिशा में काम करें। शाह ने यह भी आरोप लगाया कि नक्सली विचारधारा से जुड़े लोग अपने ही लोगों का खून बहाने में भी संकोच नहीं करते।