ब्रिक्स बाजार में कारीगरों से मिलने उमड़ी भीड़, ईरान और इथियोपिया के स्टॉल रहे आकर्षण का केंद्र

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ब्रिक्स बाजार में कारीगरों से मिलने उमड़ी भीड़, ईरान और इथियोपिया के स्टॉल रहे आकर्षण का केंद्र

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  • Publish Date - September 16, 2026 / 11:57 AM IST,
    Updated On - September 16, 2026 / 11:57 AM IST

(कुणाल दत्त)

नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) दिल्ली में आयोजित सजे-धजे ‘ब्रिक्स बाजार’ में ईरान की एक प्रसिद्ध कलाकार की उत्कृष्ट रश्ती कढ़ाई से लेकर इथियोपिया के प्रतिभागी द्वारा परोसी गई ताजा बनी स्थानीय कॉफी ने मंगलवार को अंतिम दिन बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

ब्रिक्स बाजार यहां भारत मंडपम परिसर से सटे राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय एवं हस्तकला अकादमी परिसर में लगाया गया था। यह बाजार 10 से 15 सितंबर तक आयोजित किया गया। भारत मंडपम में शनिवार और रविवार को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की बेटी जहरा पेजेश्कियान भी 12 सितंबर को कड़ी सुरक्षा के बीच बाजार पहुंची थीं। कई अन्य प्रमुख हस्तियों ने भी बाजार देखा। सोमवार को इसे आम लोगों के लिए खोला गया और मंगलवार शाम बंद होने तक यहां बड़ी संख्या में लोग आए।

ईरान के स्टॉल पर दो कारीगरों ने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए। इनमें जाहेदान शहर की नादिया करीमी शामिल थीं, जो बलूची कढ़ाई की पारंपरिक कला के संरक्षण और विकास पर काम करती हैं। दूसरी कारीगर अमेनेह सदेगी गिलान की पारंपरिक सिलाई विरासत को बढ़ावा देने और विकसित करने का काम करती हैं।

करीमी द्वारा तैयार पुरुषों की टाई और बेल्ट तथा महिलाओं के लिए बलूची हस्तशिल्प डिजाइनों वाली बालियां लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं।

ईरान के उत्तरी क्षेत्र से आने वाली सदेगी की कढ़ाई की कलाकृतियों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। सदेगी फारसी बोलती हैं और उन्होंने आगंतुकों से बातचीत के लिए इंटरनेट आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मंच का इस्तेमाल किया।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैंने 20 साल की उम्र में पारंपरिक कढ़ाई सीखना शुरू किया था। मैं पिछले 30 साल से पारंपरिक ईरानी कढ़ाई सिखा रही हूं।’’

सदेगी मुख्य रूप से सूती कपड़े पर सुई से कढ़ाई करती हैं, जिसमें शीशे का काम और चेन स्टिच प्रमुख हैं। उनका काम गिलान की पारंपरिक सिलाई विरासत, विशेष रूप से रश्ती कढ़ाई और स्थानीय परिधानों को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारंपरिक कढ़ाई को आधुनिक उत्पादों के लिए अनुकूलित करने पर केंद्रित है।

ब्रिक्स 2026 की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ‘‘ब्रिक्स बाजार ब्रिक्स समुदाय की विविध संस्कृतियों और रचनात्मक भावना का उत्सव है।’’ इसमें सदस्य और साझेदार देशों के कारीगरों, डिजाइनरों और रचनात्मक उद्यमों को एक साथ लाकर प्रामाणिक हस्तशिल्प, हथकरघा, वस्त्र, कलाकृतियां और अन्य उत्पाद प्रदर्शित किए गए।

बाजार में भारत सहित ब्रिक्स के विभिन्न सदस्य देशों और समूह के साझेदार देशों के कारीगरों एवं शिल्पकारों ने हिस्सा लिया। कुल 18 देशों का प्रतिनिधित्व यहां हुआ।

ब्राजील की अमेरिका महाद्वीप की सबसे पुरानी जीवित परंपराओं में शामिल मिट्टी कला से लेकर बेलारूस की पारंपरिक विलो बुनाई तक, इस विरासत बाजार में सदस्य और साझेदार देशों की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया गया। आयोजन स्थल पर लगे कपड़े के बैनरों ने भी इसकी खूबसूरती बढ़ाई।

ब्राजील के गोयास की सिरेमिक कारीगर और मूर्तिकार क्लेजियानिया रिबेरो डी लीमा पायवा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं कुछ दिन ही सही, भारत में रहकर और यहां की समृद्ध संस्कृति का अनुभव कर बहुत खुश हूं। यह एक शानदार अनुभव रहा।’’

आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, बचपन में अपनी मां को मिट्टी के बर्तन बनाते हुए देखने वाली पायवा ने करीब 11 वर्ष की उम्र में यह काम शुरू किया जो आज तक जारी है।

क्लेजियानिया मुख्य रूप से प्राकृतिक मिट्टी को आकृतिमूलक और सजावटी मूर्तियों में बदलती हैं।

इथियोपिया के स्टॉल पर इजिगायेहु हाइलेगियोर्गिस और मेअजा असेगिड असेफा ने अपनी कृतियां प्रदर्शित कीं। भारत में रहने वाली और धाराप्रवाह हिंदी बोलने वाली इथियोपियाई महिला फेवन मेरिड ने भी बड़ी संख्या में आगंतुकों को आकर्षित किया।

नोएडा की डिजिटल मार्केटिंग पेशेवर रीतू मौर्य ने बताया कि उन्होंने मंगलवार को बाजार देखने के लिए विशेष रूप से काम से छुट्टी ली थी। उन्होंने कहा, ‘‘मैं कारीगरों से बात करना और उनकी संस्कृति के बारे में जानना चाहती थी। ऐसा लगा जैसे दिल्ली में एक ही जगह पर मैंने इतने सारे देशों की यात्रा कर ली।’’

कुछ लोग मंगलवार शाम छह बजे के बाद पहुंचे और बाजार बंद होने के कारण इसे देखने से चूक गए।

दिल्ली की 20 वर्षीय विधि छात्रा अनुष्का शर्मा ने कहा, ‘‘मैंने इंस्टाग्राम के जरिए इसके बारे में बहुत सुना था, लेकिन देर से पहुंची और इसे देखने से चूक गई। शिल्प संग्रहालय में ब्रिक्स देशों की कला और हस्तशिल्प प्रदर्शित करने की यह बहुत अच्छी पहल थी। मैं पहले भी इस संग्रहालय में आ चुकी हूं।’’

भाषा मनीषा वैभव

वैभव