नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने असम सरकार और उसके शिक्षा विभागों को मंगलवार को निर्देश दिया कि राज्य में प्रांतीयकरण योजना के तहत विद्यालयों और महाविद्यालयों में किसी शिक्षक की नियुक्ति या सेवा में समायोजन न किया जाए।
‘वेंचर’ शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवाओं के प्रांतीयकरण की वैधानिक योजना के तहत राज्य सरकार उनके निश्चित वेतन के भुगतान की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेती है। इसके साथ ही राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू मौजूदा नियमों के अनुसार ग्रेच्युटी, पेंशन और अवकाश नकदीकरण जैसी सुविधाओं की जिम्मेदारी भी सरकार की होती है।
असम के कानून में ‘वेंचर’ शैक्षणिक संस्थानों से आशय ऐसे विद्यालयों एवं महाविद्यालयों से है जो स्थानीय लोगों द्वारा स्थापित किए गए हों और जिनकी सेवाओं का अभी सरकारीकरण/प्रांतीयकरण नहीं हुआ हो।
भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जनहित याचिकाकर्ताओं राजेश चौहान और माधब मुकुंद पुजारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार की दलीलों पर गौर किया।
जनहित याचिका में प्रांतीयकरण की व्यवस्था को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इसके जरिये ‘‘निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के बिना लोगों को नियमित सरकारी सेवा में शामिल होने की अनुमति मिलती है।’’
शीर्ष अदालत ने राज्य में वेंचर शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवाओं के प्रांतीयकरण से जुड़ी वैधानिक योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और असम सरकार, संबंधित आयुक्त एवं सचिव तथा प्रारंभिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा निदेशकों को नोटिस जारी किए।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि ऐसी व्यवस्था असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है। ये अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता और सरकारी रोजगार के मामलों में अवसर की समानता की गारंटी देते हैं।
शीर्ष अदालत ने मामले पर आगे विचार होने तक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निर्देश दिया कि लागू वैधानिक ढांचे के तहत विद्यालयों और महाविद्यालयों में किसी शिक्षक की नियुक्ति या सेवा में समायोजन न किया जाए।
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सिम्मी मनीषा
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