नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) असम सरकार ने नौ अप्रैल के विधानसभा चुनाव में राज्य में वन सुरक्षा बल के कम से कम 1600 कर्मियों की तैनाती पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा लगाई गई रोक वापस लेने का सोमवार को अनुरोध किया।
कोलकाता में एनजीटी की पूर्वी क्षेत्रीय पीठ के समक्ष दाखिल जवाब में कहा गया है कि राज्य सरकार के 19 मार्च के आदेश के खिलाफ दायर याचिका में जैव विविधता अधिनियम के प्रावधानों को गलत तरीके से ‘‘बढ़ा-चढ़ाकर’’ प्रस्तुत किया गया है और इन प्रावधानों को असम वन सुरक्षा बल (एएफपीएफ) के कर्मियों की तैनाती पर लागू कर दिया गया है।
इससे पहले, अधिकरण ने दो अप्रैल को अधिवक्ता गौरव बंसल की याचिका पर राज्य सरकार के संबंधित आदेश पर रोक लगा दी थी।
याचिका में दावा किया गया था कि चुनाव और उससे जुड़े कार्यों के लिए एएफपीएफ के कर्मियों को जैविक संसाधनों के संरक्षण और सुरक्षा की मूल जिम्मेदारियों से हटाकर चुनाव में तैनात करने से अधिकारी जैविक विविधता अधिनियम के तहत अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे हैं।
राज्य सरकार के पर्यावरण विभाग द्वारा चार अप्रैल को दिए गए जवाब के अनुसार, एएफपीएफ बटालियन का सदस्य कोई वन अधिकारी या वन कर्मचारी नहीं होता, बल्कि वह सशस्त्र बल का जवान होता है, जैसे सिपाही, लांस नायक, नायक, हवलदार, उपनिरीक्षक और निरीक्षक।
जवाब में कहा गया कि राज्य की जैविक विविधता का प्रबंधन मुख्य रूप से जैविक विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) द्वारा जैविक विविधता अधिनियम के तहत किया जाता है। असम में ऐसी 2,549 बीएमसी हैं, जो राज्य के जैविक संसाधनों और जैव विविधता की देखभाल एवं प्रबंधन करती हैं। इसमें यह भी जोड़ा गया कि राज्य सरकार द्वारा किसी प्रकार की लापरवाही का सवाल ही नहीं उठता।
यह भी कहा गया कि जैव विविधता केवल जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। हालांकि अधिसूचित वन राज्य के कुल क्षेत्रफल का 27.24 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन बाकी क्षेत्रों में भी जैव विविधता उतनी ही प्रचुर मात्रा में मौजूद है।
जवाब में इसके अलावा यह भी बताया गया कि इन बलों और वन कर्मचारियों की अधिकांश नयी नियुक्तियां पिछले तीन वर्षों में ही हुई हैं।
जवाब में कहा गया, ‘‘इसलिए याचिकाकर्ता का यह कहना पूरी तरह गलत है कि प्रतिवादी (असम राज्य और अन्य) न केवल जैविक विविधता अधिनियम के तहत अपने वैधानिक दायित्वों को निभाने में असफल रहे हैं, बल्कि उन्होंने वनों, वन्यजीवों और पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा और संरक्षण को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है।’’
इसमें यह भी कहा गया कि जैविक विविधता अधिनियम का अधिकार क्षेत्र बलों की एक ड्यूटी से दूसरी ड्यूटी में अस्थायी तैनाती जैसे मुद्दों पर लागू नहीं होता।
जवाब में यह भी कहा गया, ‘‘यह एक ऐसा कानून है जो जैव विविधता के हर पहलू को कवर करता है, जिसमें धान, मक्का, गन्ना, सब्जियां, मवेशी, पोल्ट्री, सूअर पालन और अन्य सभी पौधों तथा जैविक संसाधन शामिल हैं।’’
इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि ‘‘एएफपीएफ के कर्मचारी ऐसे किसी भी जैविक संसाधन की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार नहीं होते, जब तक कि वे अधिसूचित वनों आदि में मौजूद न हों।’’
यह भी कहा गया कि याचिका में इस अधिनियम के प्रावधानों को उसकी लागू सीमा से बाहर तक खींचने की कोशिश की गई है।
मामले की सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।
भाषा सुरेश माधव
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