भवानीपुर : ममता के राजनीतिक गढ़ में शुभेंदु अधिकारी के मैदान में उतरने से मुकाबला रोमांचक

भवानीपुर : ममता के राजनीतिक गढ़ में शुभेंदु अधिकारी के मैदान में उतरने से मुकाबला रोमांचक

भवानीपुर : ममता के राजनीतिक गढ़ में शुभेंदु अधिकारी के मैदान में उतरने से मुकाबला रोमांचक
Modified Date: April 26, 2026 / 05:41 pm IST
Published Date: April 26, 2026 5:41 pm IST

(प्रदीप्त तापदार)

कोलकाता, 26 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल की राजनीति में, भवानीपुर अब महज दक्षिण कोलकाता की एक साधारण विधानसभा सीट नहीं रह गई है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का गढ़ माने जाने वाले इस सीट से भाजपा ने विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारकर मुकाबला रोमांचक बना दिया है।

भाजपा ने इस सीट को ‘‘मनोवैज्ञानिक युद्धक्षेत्र’’ में पेश किया है, जहां उस चुनावी मुकाबले की नींव रखी जा रही है, जिसे बंगाल में कई लोग ‘‘सबसे बड़ा मुकाबला’’ कह रहे हैं।

मुख्यमंत्री और इस निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार की विधायक बनर्जी का सीधा मुकाबला विपक्ष के नेता और भाजपा के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी से है, जिसके चलते 29 अप्रैल के चुनाव ने भवानीपुर को राज्य की सबसे चर्चित ‘‘प्रतिष्ठा की लड़ाई’’ में बदल दिया है।

ममता बनर्जी के करीबी समझे जाने वाले शुभेंदु ने 2021 में तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था और उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के रूप में नंदीग्राम सीट पर बनर्जी को हराया था।

पांच साल बाद, अब यह चुनावी मुकाबला बनर्जी के गढ़ में हो रहा है। तृणमूल कांग्रेस के लिए, भवानीपुर सीट बरकरार रखना मुख्यमंत्री के अपने ही क्षेत्र में उनकी राजनीतिक सत्ता को बरकरार रखने जैसा है। भाजपा के लिए, इसे भेदना बंगाल की सबसे शक्तिशाली नेता के इर्द-गिर्द बनी ‘‘अजेय’’ की छवि को तोड़ने जैसा होगा।

कोलकाता नगर निगम के आठ वार्ड में फैला भवानीपुर अक्सर ‘मिनी इंडिया’ कहलाता है, एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र जहां बंगाली, गुजराती व्यापारी, पंजाबी और सिख परिवार, मारवाड़ी और जैन परिवार, साथ ही बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता रहते हैं। बिहार, ओडिशा और झारखंड से आए प्रवासी इस सामाजिक विविधता में एक और आयाम जोड़ते हैं।

भवानीपुर में लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू हैं, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और लगभग 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो इस निर्वाचन क्षेत्र को सामाजिक रूप से विविध और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाते हैं। ऐसा लगता है कि इसी समीकरण ने अधिकारी को बनर्जी को उनके गृह क्षेत्र में चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया है।

भाजपा ने महीनों से भवानीपुर में बूथ-दर-बूथ का आंकड़ा तैयार किया है। पार्टी नेताओं का दावा है कि मतदाताओं में कायस्थ 26.2 प्रतिशत, मुस्लिम 24.5 प्रतिशत, पूर्वी भारत का प्रवासी समुदाय 14.9 प्रतिशत, मारवाड़ी 10.4 प्रतिशत और ब्राह्मण 7.6 प्रतिशत हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इस कवायद से यह पता लगाने में मदद मिली कि बंगाली हिंदू बहुसंख्यक क्षेत्र कौन से हैं, हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय कहां केंद्रित हैं और किन बूथ पर मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव रहने की संभावना है।

कोलकाता के महापौर और टीएमसी के वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने कहा, ‘‘यह सिर्फ एक साधारण सीट नहीं है। यहां के लोग ममता बनर्जी की विकास और समावेशिता की राजनीति का बार-बार समर्थन करते रहे हैं।’’

टीएमसी ने ‘घर की बेटी’ के भावनात्मक नारे को भी फिर से उठाया है, ताकि बनर्जी के समर्थन में लोगों को लामबंद किया जा सके।

यह चुनाव प्रचार आक्रामकता के बजाय आत्मीयता पर अधिक केंद्रित है – बनर्जी को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि मोहल्ले की अपनी दीदी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाएं इस लोकप्रियता का मुख्य आधार बनी हुई हैं।

हालांकि, भाजपा का मानना ​​है कि स्थिति बदल गई है। उसकी रणनीति बूथ स्तर पर जातिगत समीकरणों और बंगाली एवं गैर-बंगाली समुदायों के हिंदू वोटों को एकजुट करने पर आधारित है।

भाजपा नेता देबजीत सरकार ने कहा, ‘‘यहां की लड़ाई एक नारे से नहीं लड़ी जा सकती। इसे बूथ दर बूथ, समुदाय दर समुदाय लड़ना होगा। राज्य अब ‘राम राज्य’ चाहता है। लोग तुष्टीकरण की राजनीति से ऊब चुके हैं।’’

भाषा शफीक दिलीप

दिलीप


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