भोजशाला परिसर विवाद: उच्चतम न्यायालय में एक और याचिका दाखिल

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भोजशाला परिसर विवाद: उच्चतम न्यायालय में एक और याचिका दाखिल

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  • Publish Date - May 28, 2026 / 06:09 PM IST,
    Updated On - May 28, 2026 / 06:09 PM IST

नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए एक नई याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि धार जिले का विवादित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती का मंदिर है।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन पर केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) निर्णय ले सकते हैं।

हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय 11वीं शताब्दी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद कहता है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।

जेब्रान अंसारी नामक एक व्यक्ति ने उच्च न्यायालय के 15 मई के आदेश को चुनौती दी है।

इससे पहले, मस्जिद के कार्यवाहक काजी मोइनुद्दीन ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी।

हिंदू पक्ष ने पहले ही उच्चतम न्यायालय में एक कैविएट दायर कर कहा है कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर बिना उसका पक्ष सुने कोई आदेश पारित न किया जाए।

जितेंद्र सिंह ‘विशेन’ द्वारा अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दायर कैविएट में कहा गया, ‘‘उक्त मामले में मुझे सूचना दिए बिना कोई आदेश न दिया जाए।’’

विशन इस मामले में छठे याचिकाकर्ता थे, जिस पर इंदौर उच्च न्यायालय की एक पीठ ने फैसला सुनाया।

उच्च न्यायालय ने एएसआई के सात अप्रैल, 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया है, जिसमें मुसलमानों को भोजशाला परिसर के अंदर हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय मस्जिद के निर्माण के लिए जिले में अलग से भूमि आवंटन के लिए मध्य प्रदेश सरकार से संपर्क कर सकता है।

अपने बहुप्रतीक्षित फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा कि भोजशाला परिसर में संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व के संकेत मिले हैं।

उच्च न्यायालय ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर फैसला सुनाया।

उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद का धार्मिक स्वरूप देवी सरस्वती के मंदिर के रूप में स्थापित हुआ है।’’

अदालत ने विवादित स्मारक पर एएसआई की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा था कि यह संरचना परमार वंश के राजा भोज से संबंधित है, जो एक राजपूत राज्य था जिसने 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच वर्तमान मध्य भारत के मालवा क्षेत्र पर शासन किया था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी, जो मुस्लिम पक्ष की तरफ से इस मामले में एक पक्ष है, धार जिले में मस्जिद के निर्माण के लिए भूमि आवंटन के लिए आवेदन करती है, तो राज्य सरकार कानूनी प्रावधानों के अनुसार इस पर विचार कर सकती है।

भोजशाला विवाद के बाद एएसआई ने सात अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया, जिसमें हिंदुओं को हर मंगलवार को परिसर में पूजा करने की अनुमति दी गई और मुसलमानों को हर शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई।

हिंदू पक्ष ने परिसर में पूजा के अनन्य अधिकार की मांग करते हुए इस आदेश को अदालत में चुनौती दी।

जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह परिसर एक मध्ययुगीन जैन मंदिर और गुरुकुल (पारंपरिक शिक्षण केंद्र) था।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद 2024 में एएसआई ने स्मारक का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने के बाद अपनी 2,000 से अधिक पृष्ठ की रिपोर्ट में बताया कि धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद से पहले की थी और वर्तमान विवादित संरचना का निर्माण मंदिर के पुराने हिस्सों का उपयोग करके किया गया था।

उच्च न्यायालय ने एएसआई को 11 मार्च, 2024 को विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था।

भाषा संतोष माधव

माधव