बुलडोजर कार्रवाई: अवमानना याचिकाओं पर विचार करने से न्यायालय का इनकार
बुलडोजर कार्रवाई: अवमानना याचिकाओं पर विचार करने से न्यायालय का इनकार
नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उन अवमानना याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि न्यायालय के 2024 के एक फैसले का उल्लंघन करते हुए ध्वस्तकीकरण की कार्रवाई की गयी है।
न्यायालय ने प्रभावित पक्षों को संबंधित उच्च न्यायालयों का रुख करने को कहा। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि तथ्यों के आधार पर कई ऐसे सवाल हैं, जिन पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इन कार्यवाहियों से जुड़े रिकॉर्ड संबंधित उच्च न्यायालयों को भेजेगी।
साथ ही, न्यायालय ने उच्च न्यायालयों से संबंधित रिकॉर्ड तलब करने और जरूरत पड़ने पर जिला अदालतों के माध्यम से साक्ष्य जुटाकर सभी तथ्यात्मक मुद्दों का निर्धारण करने को कहा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायालय ने आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
पीठ ने निर्देश दिया कि न्यायालय द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा, उच्च न्यायालयों में कार्यवाही लंबित रहने तक जारी रहेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि, पक्षकारों को संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष अंतरिम आदेशों में संशोधन का अनुरोध करने की स्वतंत्रता होगी और उच्च न्यायालय ऐसी अर्जियों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेंगे।’’
पीठ ने उच्च न्यायालयों से मामले का निपटारा यथासंभव चार महीने के भीतर करने का अनुरोध किया।
सुनवाई के दौरान, सोमनाथ में मस्जिदों को गिराए जाने से संबंधित मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने कहा कि इस मामले में सार्वजनिक भूमि पर कोई अतिक्रमण नहीं था।
उन्होंने शीर्ष अदालत के आदेशों का ‘‘गंभीर उल्लंघन’’ किए जाने का आरोप लगाया और कहा कि अधिकारियों ने न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए कार्रवाई की।
प्रधान न्यायाधीश ने इस दलील पर टिप्पणी की, ‘‘मुख्य शिकायत यह प्रतीत होती है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है। आप (अधिकारी) कहेंगे कि प्रक्रिया का पालन किया गया है और दूसरा पक्ष इससे इनकार करेगा। क्यों न हम यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दें और उच्च न्यायालय को इस पर निर्णय लेने दें।’’
महाराष्ट्र से संबंधित एक अवमानना मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह ने दावा किया कि कई बार स्थानीय नेताओं द्वारा ‘‘बुलडोजर कार्रवाई’’ का आह्वान किए जाने के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे कई मामले हैं, जहां इस तरह की कार्रवाई स्पष्ट रूप से ‘‘दंडात्मक कार्रवाई’’ के रूप में की जाती है।
सिंह ने दलील दी कि अगर न्यायालय को लगता है कि अवमानना नहीं हुई है तो याचिका खारिज की जा सकती है।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर उच्चतम न्यायालय अपने ही फैसले के लिए खड़ा नहीं होता है, तो मुझे यह कहते हुए खेद है…।’’
न्यायमूर्ति बागची ने इसके बाद टिप्पणी की, ‘‘फैसले को कानून नहीं माना जा सकता। निर्देश कुछ शर्तों और सीमाओं के साथ दिए गए हैं। ये निर्देश केवल उन वैधानिक अधिकारों की पुन: पुष्टि के रूप में हैं, जो पहले से मौजूद हैं।’’
न्यायमूर्ति ने कहा, ‘‘यह फैसला इसलिए दिया गया क्योंकि न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दिया गया था। निर्दोष भाव की धारणा का आधार था…। हां, जब अधिकारियों और अवैध अतिक्रमणकारियों की मिलीभगत से कानून का शासन कमजोर होता है, तब बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है।’’
शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद उन्हें संबंधित उच्च न्यायालयों का रुख करने को कहा।
उच्चतम न्यायालय ने ‘‘बुलडोजर कार्रवाई’’ की आलोचना करते हुए 13 नवंबर, 2024 को संपत्तियों को गिराने के मामले में देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे।
न्यायालय ने कहा था कि कार्यपालिका न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभा सकती, किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं कर सकती और उसका घर नहीं गिरा सकती।
पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा था, ‘‘किसी भी संपत्ति को गिराने की कार्रवाई कारण बताओ नोटिस जारी किए बिना नहीं की जानी चाहिए। यह नोटिस संबंधित स्थानीय नगर निकाय कानूनों में निर्धारित अवधि के अनुसार या नोटिस की तामील की तारीख से 15 दिन के भीतर, इनमें से जो अवधि बाद में समाप्त हो, उस समय तक प्रभावी होना चाहिए।’’
भाषा जितेंद्र अविनाश
अविनाश

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