सीईसी, ईसी की नियुक्ति पर कानून बनाने के लिए क्या संसद को निर्देश दिया जा सकता है: न्यायालय

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सीईसी, ईसी की नियुक्ति पर कानून बनाने के लिए क्या संसद को निर्देश दिया जा सकता है: न्यायालय

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  • Publish Date - May 6, 2026 / 09:30 PM IST,
    Updated On - May 6, 2026 / 09:30 PM IST

नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सवाल किया कि क्या वह संसद को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे सकता है।

ये टिप्पणियां न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने उस दौरान कीं, जब 2023 के संबंधित कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई हो रही थी। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर रखा गया है।

शीर्ष अदालत ने शुरू में ही केंद्र सरकार की सुनवाई टालने की मांग ठुकरा दी और कहा कि यह मामला ‘‘शबरिमला मामले से अधिक महत्वपूर्ण’’ है।

न्यायमूर्ति दत्ता ने सुनवाई के दौरान एक याचिका में की गई उस प्रार्थना का उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत से संसद को सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।

उन्होंने पूछा, “याचिका में किये गये अनुरोध पर आइए… इसमें संसद से कानून बनाने को कहा गया है। क्या अदालत संसद को कानून बनाने के लिए कह सकती है? क्या यह याचिका इस रूप में स्वीकार्य है?’’

उन्होंने ‘‘अनूप बरनवाल मामले’’ में पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के दो मार्च 2023 के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वसम्मति से कहा गया था कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों का चयन तीन-सदस्यीय समिति द्वारा किया जाएगा, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (या संसद में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और सीजेआई शामिल होंगे।

इस फैसले ने पहले से चली आ रही उस व्यवस्था में बदलाव किया था, जिसमें सीईसी और ईसी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती थी।

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद कोई कानून नहीं बना देती।

उन्होंने कहा, ‘‘आखिर अदालत ने अनूप बरनवाल के फैसले को एक निश्चित अवधि तक, यानी कानून बनने तक ही क्यों सीमित किया? यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी।’’

न्यायाधीश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय संसद को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकता। उन्होंने कहा, ‘‘क्या 300 से अधिक पन्नों में की गई ये टिप्पणियां केवल उस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए नहीं थीं, जिसे अदालत ने कानून बनने तक अस्थायी रूप से लागू किया था? क्या आप कह सकते हैं कि बनने वाला कानून भी इन्हीं टिप्पणियों का पालन करे?’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब अदालत ने यह कह दिया कि सीईसी और ईसी का चयन केवल कार्यपालिका द्वारा नहीं होना चाहिए, तो वह वहीं क्यों रुक गई? अदालत ने मानक तय किए, फिर उन्हें सिर्फ कानून बनने की एक निश्चित अवधि तक ही क्यों सीमित किया? इस फैसले को साधारण रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी।’’

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने 2023 के कानून को चुनौती देते हुए दलीलों की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की धारा-सात नियुक्तियों में सत्तारूढ़ कार्यपालिका को “प्राथमिकता” देती है, जो निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए “घोर आपत्तिजनक” है। नये कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं।

हंसारिया ने कहा कि यह 2-1 का अनुपात प्रभावी रूप से सरकार को वर्चस्व प्रदान करता है, जिससे वह “प्रधानमंत्री के पसंदीदा व्यक्ति” की नियुक्ति कर सकती है।

उन्होंने सत्तारूढ़ दल के हितों के टकराव का भी उल्लेख किया और कहा कि उसका चुनाव परिणामों में सीधा हित होता है, इसलिए चयन प्रक्रिया को कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए।

वह न्यायमूर्ति दत्ता की उस टिप्पणी का जवाब दे रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि अनूप बरनवाल मामले में दिया गया फैसला केवल एक ‘अंतरिम व्यवस्था’ थी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा, ‘‘अगर न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक शब्द कहे जाएं, तो क्या हमें कोलेजियम प्रणाली को हटा देना चाहिए? यह किस तरह का तर्क है?’’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि चूंकि ‘बरनवाल मामले’ का फैसला संविधान पीठ का सर्वसम्मत निर्णय था, इसलिए कार्यपालिका के नियंत्रण से जुड़े उसके सिद्धांतों को केवल संवैधानिक संशोधन के जरिये ही बदला जा सकता है, न कि किसी सामान्य कानून के माध्यम से।

मामले में अगली सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी।

भाषा सुरेश अविनाश

अविनाश