नयी दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि पांच शिकायतकर्ता पहलवानों में से दो ने बताया कि उन्हें भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने के लिए “मजबूर किया गया/दबाव डाला गया” था।
अदालत ने कहा कि उनकी गवाही से लगता है कि यह मामला राजनीति से प्रेरित, “झूठा, मनगढ़ंत और गहरी साजिश के तहत सामूहिक रूप से तैयार किया गया” है।
सिंह को यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी करने वाले फैसले की एक प्रति ‘पीटीआई-भाषा’ ने देखी है। इसमें अदालत ने सवाल उठाया कि शिकायतकर्ताओं ने कथित पहली घटना को लेकर कैसे “गलत देश और साल” का जिक्र किया।
उसने कहा कि “यह विरोधाभास अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करता है और गवाह की विश्वसनीयता पर असर डालता है”, क्योंकि “यौन उत्पीड़न की कथित घटना जिस स्थान पर हुई थी, उसे याद न रख पाना कोई सामान्य बात नहीं, बल्कि असाधारण व्यवहार है।”
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्विनी पंवार ने 239 पन्नों के अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता पहलवानों ने दावा किया कि चूंकि उन्हें अपना करियर खत्म होने का डर था, इसलिए उन्होंने आरोपी के खिलाफ समय रहते कोई आरोप नहीं लगाया, लेकिन “यह बात समझ से परे है” कि उन्होंने बृजभूषण के साथ वर्षों तक “सौहार्दपूर्ण रिश्ते” कैसे बनाए रखे और “उन्हें (बृजभूषण) पारिवारिक आयोजनों तथा विवाह समारोहों में बुलाया।”
अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद रह चुके बृजभूषण और डब्ल्यूएफआई के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को विनेश फोगाट समेत छह महिला पहलवानों की ओर से दर्ज कराए गए यौन उत्पीड़न मामले में सबूतों की कमी के आधार पर तीन अगस्त को बरी कर दिया था।
फैसले की प्रति अभी तक अदालत की वेबसाइट पर अपलोड नहीं की गई है। इसमें 21 अप्रैल 2023 को पुलिस के समक्ष दायर की गई शिकायतों का जिक्र किया गया है, जिन्हें अदालत ने “काफी मिर्च-मसाला” लगाकर “खास तौर पर तैयार की गई और शानदार ढंग से लिखी गई औपचारिक शिकायतें” बताया है।
फैसले में कहा गया है कि “पीड़िताओं” ने यौन उत्पीड़न की कथित पहली घटना को लेकर गलत देश और साल का जिक्र किया, जो दिखाता है कि सभी आरोप झूठे एवं मनगढ़ंत हैं, जिन्हें दो अन्य शिकायतकर्ता पहलवानों और महादेव अकादमी के कोच के कहने पर आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ “राजनीति से प्रेरित” एक गहरी साजिश के तहत मिलकर लगाया गया है।
इसमें कहा गया है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहा है।
अदालत ने बृजभूषण को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 (किसी महिला का शील भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग), 354ए (यौन उत्पीड़न) और 506 (1) (आपराधिक धमकी) के तहत “सभी आरोपों” से बरी कर दिया। वहीं, तोमर को आईपीसी की धारा 506 (1) के तहत लगे आरोपों से बरी किया गया।
फैसले के मुताबिक, “रिकॉर्ड पर पेश की गई सामग्री से यह बात सामने आई है कि धरने पर बैठने से पहले (अभियोजन पक्ष के गवाह और पहलवान की ओर से) यौन उत्पीड़न का कोई आरोप नहीं लगाया गया था और न ही किसी ऐसी महिला पहलवान का नाम लिया गया था, जिसने कथित यौन उत्पीड़न का सामना किया हो।”
फैसले में कहा गया है कि इसके बाद “चुने गए” कुछ पहलवान सामने आए और यौन उत्पीड़न के आरोपों वाली शिकायतें दर्ज कराईं, जिनकी भाषा और शैली एक समान थी।
इसमें कहा गया है, “अदालत यह बात इस तथ्य के आधार पर कह रही है कि जिन पांच पीड़िताओं के आरोपों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे, उनमें से दो ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया है और कहा है कि (दो पहलवानों के कहने पर) उन पर बयान देने का दबाव डाला गया/मजबूर किया गया था।”
फैसले में इस बात पर जोर दिया गया है कि अभियोजन पक्ष ऐसी कोई भी दलील पेश नहीं कर पाया, जिससे साबित हो कि आरोपी की किसी हरकत की वजह से इन दो कथित पीड़िताओं ने उसके (अभियोजन पक्ष) मामले का समर्थन नहीं किया।
फैसले के अनुसार, जिन दो पहलवानों को शुरू से ही पीड़िता बताया जा रहा था, वे अदालत में पेश हुईं और बाद में उनकी काउंसलिंग की गई, जिसके बाद उन्होंने साफ तौर पर माना कि उनके साथ यौन उत्पीड़न की कोई घटना नहीं हुई थी।
फैसले में अभियोजन पक्ष के एक मुख्य गवाह के बयान में विसंगतियों और विरोधाभासों को रेखांकित किया गया है।
इसमें कहा गया है, “जिरह के दौरान उक्त गवाह ने कहा कि चूंकि वह कई वर्षों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई स्पर्धाओं में हिस्सा लेती आ रही है, इसलिए हर जगह का नाम और विवरण याद रखना बहुत मुश्किल था।”
फैसले में कहा गया है, “इसमें कोई शक नहीं कि पीड़िता समेत हर किसी के लिए उन सभी जगहों के नाम और विवरण याद रखना वाकई बहुत मुश्किल है, जहां स्पर्धाएं हुई थीं। हालांकि, उस जगह को याद न रख पाना, जहां यौन उत्पीड़न की कथित घटना हुई थी-और वह भी सबके सामने, एक रेस्तरां में, जहां कई खिलाड़ी, कोच और पीड़िता के रिश्तेदार भी मौजूद थे, और जहां ऐसी ‘हरकत’ तीन-चार बार हुई-कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि असाधारण व्यवहार है।”
भाषा पारुल दिलीप
दिलीप