अन्य चुनाव आयुक्तों की ‘सहमति के बिना’ लिये गये सीईसी के फैसलों को न्यायालय में चुनौती
अन्य चुनाव आयुक्तों की ‘सहमति के बिना’ लिये गये सीईसी के फैसलों को न्यायालय में चुनौती
नयी दिल्ली, 25 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए फैसलों, जारी दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह के कदम सामूहिक निर्णय लेने की वैधानिक अनिवार्यता का उल्लंघन करते हैं।
अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका में अनुरोध किया गया है कि ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए फैसलों, जारी दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर में किये गये बदलावों को असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया जाए।
आवश्यक सहमति के बिना कथित रूप से लिए गए फैसलों को चुनौती देने के अलावा, याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन से संबंधित प्रावधानों के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘किसी भी वैधानिक या संवैधानिक संरक्षण से वंचित होने पर मुख्य चुनाव आयुक्त कानून के तहत सीधे जवाबदेह रहते हैं। वह पुलिस जांच, साक्ष्य जुटाने और एक सामान्य आरोपी की तरह नियमित सुनवाई की प्रक्रिया के अधीन होते हैं।’’
यह याचिका समाचारपत्र ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद दाखिल की गई है जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
याचिकाकर्ता ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का हवाला दिया है, विशेष रूप से इसकी धारा 18 का उल्लेख किया गया है। इस धारा के तहत निर्वाचन आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रावधान है और कहा गया है कि यदि किसी विषय पर मतभेद होता है तो बहुमत का निर्णय प्रभावी होगा।
रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों को लेकर बार-बार मतभेद सामने आए।
मुख्य मुद्दों में से एक प्रपत्र-6 में किए गए बदलाव से जुड़ा है, जिसका इस्तेमाल मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के इच्छुक लोग करते हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पूर्वजों के विवरण और पिछले एसआईआर से जुड़ी एक अनिवार्यता निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर के माध्यम से चुनाव नियमों में जरूरी वैधानिक संशोधन किए बिना ही शामिल कर दी गई।
इसमें दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी और उनका मत था कि निर्धारित प्रपत्र में वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना बदलाव नहीं किया जा सकता।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग की डिजिटल प्रणालियों का तेजी से केंद्रीकरण किया जा रहा है, जिससे निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले अन्य अधिकारियों की वैधानिक शक्तियां सीमित हो रही हैं।
इसमें गोवा और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मामलों पर भी चिंता जताई गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के सत्यापन के निर्देश दिए जाने के बावजूद सॉफ्टवेयर में उन्हें फिर से शामिल करने की कोई सुविधा नहीं थी।
याचिका में निर्वाचन आयोग के आईटी विभाग की प्रशासनिक जिम्मेदारी के आवंटन से संबंधित 28 जुलाई के आदेश को भी चुनौती दी गई है।
याचिका के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस आदेश पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद उन्होंने इसे वापस लेने की मांग की और 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत इसकी वैधता पर सवाल उठाए।
इसमें आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने और गोवा के 97 मतदाताओं तथा इसी तरह की स्थिति वाले अन्य लोगों के नाम बहाल करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश

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