नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि चंद्रमा की सतह केवल धूल की एक समान परत नहीं है, बल्कि यह ‘केक जैसी’ दो अलग-अलग परतों वाली संरचना है, जिसकी ऊपरी परत महज कुछ सेंटीमीटर मोटी है।
इसरो के अनुसार, ये परतें दर्शाती हैं कि चंद्रमा की सतह पर चंद्र पपड़ी के ठोस बनने के बाद से सूक्ष्म उल्कापिंड लगातार गिरते रहे, जिससे सतह पर लगातार प्रहार हुए और टूट-फूट हुई।
यह विश्लेषण ‘फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी’ के वैज्ञानिकों ने किया। यह अंतरिक्ष एवं संबद्ध विज्ञानों के लिए राष्ट्रीय शोध संस्थान है, जिसे मुख्य रूप से भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग का सहयोग प्राप्त है।
अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने उस स्थान का परीक्षण किया, जहां चंद्रयान-3 का ‘विक्रम’ लैंडर दो सितंबर, 2023 को कुछ दूर तक उछला था।
इसरो ने कहा, “जब लैंडर के इंजन ‘उछाल’ के दौरान सक्रिय हुए, तब निकास गैसों ने ब्लोअर की तरह काम किया और ऊपर की तीन सेंटीमीटर धूल को हटा दिया। इससे नीचे मौजूद अधिक पुरानी और सघन चंद्र सतह उजागर हुई।”
अध्ययन में यह भी पाया गया कि सतह पर हल्की धूल है, लेकिन केवल 6.5 सेंटीमीटर की गहराई पर उसका घनत्व दोगुना और सघनता पांच गुना अधिक हो जाती है।
अध्ययन के अनुसार, किसी अंतरिक्ष यात्री के लिए सतह पर चलना सूखे आटे पर चलने जैसा महसूस होगा, जबकि कुछ सेंटीमीटर नीचे की परत नम और कठोर मिट्टी जैसी प्रतीत होगी।
इसरो ने कहा, “ये निष्कर्ष चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सतही अभियानों के लिए अधिक जानकारी उपलब्ध कराते हैं।”
उसने कहा कि भविष्य की अंतरिक्ष अन्वेषण योजनाओं, विशेषकर चंद्रमा पर वैज्ञानिक ठिकानों के निर्माण के लिए, चंद्र सतह की विविध विशेषताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।
इसरो ने कहा, “यह अध्ययन इस प्रकार की विशिष्ट मापों की श्रेणी में पहला अध्ययन है।”
भाषा मनीषा वैभव
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