नयी दिल्ली, 11 सितंबर (भाषा) भारतीय मध्यस्थता परिषद के गठन में देरी का मुद्दा उठाते हुए उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुक्रवार को भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने मध्यस्थता संस्थानों और विशेषज्ञों से वैधानिक नियामक के काम शुरू करने का इंतजार करने के बजाय स्व-नियमन विकसित करने का आग्रह किया।
‘मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन’ द्वारा आयोजित ‘इंडिया एडीआर वीक 2026’ को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मध्यस्थों के लिए एक अंतर-संस्थागत सार्वजनिक सूचना रजिस्टर बनाने का प्रस्ताव रखा।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं एक असुविधाजनक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। मध्यस्थता के लिए राष्ट्रीय नियामक निकाय यानी भारतीय मध्यस्थता परिषद बनाने वाला कानून 2019 में पारित हुआ था। अब छह साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन यह परिषद अभी भी अस्तित्व में नहीं आई है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मैं यह किसी को शर्मिंदा करने के लिए नहीं कह रहा हूं। मुझे पता है कि सरकार एक नए मध्यस्थता विधेयक पर काम कर रही है, जो इस संस्था को नया स्वरूप दे सकता है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह सभा केवल दिल्ली (केंद्र सरकार) के इस फैसले का इंतजार नहीं कर सकती कि मध्यस्थता समुदाय को खुद को कैसे विनियमित करना चाहिए।’’
भाषा शफीक देवेंद्र
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