नयी दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा) तापमान, लू और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध पर किये गए वैश्विक अध्ययन की समीक्षा से पता चला है कि पांच से 18 साल की उम्र के बच्चे और किशोर सबसे ज्यादा जोखिम वाले आयुवर्ग में हैं।
‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी’ में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि तापमान में प्रत्येक एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी प्रतिकूल समस्याओं का खतरा लगभग एक प्रतिशत बढ़ जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के ‘कॉलेज ऑफ मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ’ में महामारी विज्ञानी और एसोसिएट प्रोफेसर तथा अध्ययन की सह-लेखिका जैकलीन स्टीफंस ने कहा, “ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से बच्चे जलवायु में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। ये बदलाव सामाजिक और विकास संबंधी तनाव से जुड़े होते हैं, जिनमें घर से बाहर की गतिविधियों में बाधा, उनकी शिक्षा और मनोरंजन के अवसरों पर असर शामिल हैं।”
स्टीफंस ने कहा, “किशोरावस्था मानसिक स्वास्थ्य के विकास का एक संवेदनशील दौर होता है जिससे अत्यधिक गर्मी के प्रभावों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ सकती है। अधिक तापमान का संबंध बच्चों में सीखने की क्षमता और शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट से भी पाया गया है।”
शोधकर्ताओं ने 23 वैश्विक अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह भी पाया कि लू के दौरान खराब मानसिक स्वास्थ्य का जोखिम 25 प्रतिशत और ज्यादा तापमान में 1.5 प्रतिशत बढ़ जाता है।
लेखकों ने लिखा, “पांच से 18 साल की उम्र के बच्चे सबसे ज्यादा जोखिम में थे; ज्यादा तापमान के कारण उनमें जोखिम 1.5 प्रतिशत और लू के दौरान 25 प्रतिशत बढ़ गया।”
स्टीफंस ने कहा, “इसके असर में गर्म रातों में नींद में खलल पड़ना शामिल हो सकता है जिससे सेहत और भावनाओं को संभालने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। साथ ही, माता-पिता की मानसिक सेहत, देखभाल का तनाव और परिवार में झगड़े जैसे अप्रत्यक्ष असर भी हो सकते हैं। ये सभी चीजें लू और खराब मौसम की घटनाओं के दौरान बढ़ जाती हैं, जो अब आम होती जा रही हैं।”
शोध करने वालों का कहना है कि इन नतीजों से पता चलता है कि जलवायु-अनुकूलन की कोशिशों में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने और बच्चों व युवाओं के लिए खास उपाय करने की जरूरत है।
फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के ‘कॉलेज ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग’ में वैश्विक पारिस्थितिकी के प्रोफेसर और इस अध्ययन के सह-लेखक कोरी ब्रैडशॉ ने कहा, “बच्चे और युवा गर्मी के प्रति अपनी शारीरिक और व्यवहार संबंधी संवेदनशीलता के कारण ज्यादा जोखिम में होते हैं, क्योंकि वे अब भी विकसित हो रहे होते हैं और भीषण गर्मी के दौरान बचाव के उपाय अपनाने की संभावना उनमें कम होती है।”
ब्रैडशॉ ने कहा कि समीक्षा में यह भी पाया गया कि विकसित देशों में जोखिम ज्यादा थे; यह संभवतः ‘अर्बन हीट आइलैंड’ के असर और युवाओं की मानसिक सेहत पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए ज़्यादा मदद की कोशिशों को दर्शाता है।
‘अर्बन हीट आइलैंड’ वह स्थिति है जिसमें कोई शहरी क्षेत्र अपने आसपास के ग्रामीण या कम विकसित इलाकों की तुलना में काफी अधिक गर्म हो जाता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं के अनुसार, मध्यम आय वाले देशों में गर्मी के कम प्रभाव दर्ज होने का कारण लोगों की कम संवेदनशीलता नहीं, बल्कि मामलों की कम रिपोर्टिंग हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि ये निष्कर्ष केवल अत्यधिक गर्मी के खतरों को समझने तक सीमित रहने के बजाय इस बात पर ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करते हैं कि बढ़ते तापमान के बीच बच्चों और युवाओं को बेहतर तरीके से कैसे सुरक्षित किया जा सकता है।
अध्ययन की सह-लेखिका और ऑस्ट्रेलिया स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैनबरा के ‘एचईएएल ग्लोबल रिसर्च सेंटर’ की सैयदा हीरा फातिमा ने कहा कि बच्चों पर केंद्रित व्यावहारिक उपायों में “ठंडी कक्षाओं की व्यवस्था, बेहतर हवादार और छायादार बाहरी स्थान जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं। इसके साथ ही यह पता लगाने के लिए शोध की भी जरूरत है कि क्या ये उपाय बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण में वास्तविक सुधार ला सकते हैं।”
भाषा प्रशांत नरेश
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