नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) लिटिल निकोबार और ग्रेट निकोबार की आदिवासी परिषद ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम को एक पत्र लिखकर उस प्रमाणपत्र को वापस लेने की मांग की है, जो ग्रेट निकोबार द्वीप पर सभी वन अधिकारों के निपटारे की पुष्टि करता है।
निकोबार जिले के उपायुक्त द्वारा 18 अगस्त 2022 को जारी किए गए इस ‘वन अधिकार मान्यता’ प्रमाणपत्र ने ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने का मार्ग प्रशस्त किया था।
कुल 81,000 करोड़ रुपये की यह बड़ी अवसंरचना परियोजना 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मैं फैली हुई है। इसमें एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एक समेकित टाउनशिप, एक नागरिक और सैन्य हवाई अड्डा और 450 एमवीए (मेगावोल्ट एम्पीयर) का गैस और सौर ऊर्जा आधारित संयंत्र का निर्माण शामिल है।
यह पत्र 30 जून को लिखा गया। इसमें कहा गया है, ‘‘जब वन अधिकार अधिनियम के तहत हमें मिले अधिकारों को मान्यता दी जाएगी और निकोबार के उपायुक्त द्वारा हमारे 130.65 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र के भूमि उपयोग के लिए जारी किया गया गलत प्रमाणपत्र वापस लिया जाएगा, तभी हम खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे।’’
यह पत्र ओराम के उस बयान के जवाब में लिखा गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘यह समझना जरूरी है कि विकास और जनजातीय संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।’’
वन अधिकार अधिनियम, 2006, इसके नियमों और पर्यावरण मंत्री के 2009 के एक आदेश के अनुसार, किसी परियोजना के लिए वन भूमि के उपयोग में परिवर्तन करने से पहले वन अधिकारों से जुड़े दावों का निपटारा किया जाना आवश्यक है।
द्वीपों पर निकोबार समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि निकोबार जनजातीय परिषद ने इस मुद्दे को लेकर पिछले साल जुलाई में भी जनजातीय कार्य मंत्री को पत्र लिखा था। परिषद ने आरोप लगाया था कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह प्रशासन ने प्रमाणपत्र को लेकर केंद्र सरकार को गलत जानकारी दी।
परिषद ने आरोप लगाया कि वन अधिकार अधिनियम के तहत वन अधिकारों के निपटारे की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई थी।
इस साल मई में कलकत्ता उच्च न्यायालय पूर्व केंद्रीय सचिव मीना गुप्ता की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हुआ था। इस याचिका में भी ग्रेट निकोबार द्वीप पर वन अधिकारों के निपटारे के संबंध में इसी तरह के आरोप लगाए गए थे।
परिषद के ताजा पत्र में कई अन्य मांगें भी रखी गई हैं, जिनमें महत्वपूर्ण अवसंरचना की जरूरत भी शामिल है।
पत्र में कहा गया, ‘‘राजीव नगर जनजातीय कॉलोनी में सुनामी से बचाव के लिए बनाए गए आश्रय स्थल, जहां हम वर्तमान में रह रहे हैं, 20 साल से अधिक पुराने हैं और उनकी मरम्मत किये जाने की तत्काल जरूरत है।’’
इसमें यह भी कहा गया है, ‘‘जब हम स्थानीय प्रशासन से इन आश्रय स्थलों की मरम्मत करने के लिए कहते हैं, तो हमें बताया जाता है कि बजट नहीं है, जबकि वही अधिकारी हमें आश्वासन देते हैं कि ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए अपनी जमीन देने के बाद हमें जो कुछ भी चाहिए, मिल जाएगा।’’
भाषा सुभाष नरेश
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