नैनीताल, पांच जनवरी (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम के तहत एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए हत्या के एक मामले में 13 साल से जेल में बंद एक कैदी को तत्काल रिहा किए जाने के आदेश दिए हैं।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रविंद्र मैंठाणी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने पाया कि अपराध के समय दोषी नाबालिग था, जिसके कारण उसे दी गई आजीवन कारावास की सजा अब कानूनी रूप से मान्य नहीं रह गयी है।
वर्ष 2003 में रुड़की में हुई हत्या और लूट के प्रयास के संबंध में आरोपी को सत्र अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था। इस दोषसिद्धि को 2013 में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने बरकरार रखा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इसकी पुष्टि की थी ।
वर्ष 2021 में हत्या के मामले में दोषी ने जेल से एक अर्जी भेजी जिसमें दावा किया गया कि घटना की तारीख यानी 24 जून 2003 को वह नाबालिग था। इस दावे की पुष्टि करने के लिए, अदालत ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया।
स्कूल के रिकॉर्ड, छात्र रजिस्टर और गवाहों के बयानों की गहन जांच के बाद, रजिस्ट्रार (न्यायिक) ने पाया कि दोषी की वास्तविक जन्म तिथि 22 मई 1988 थी और घटना के समय उसकी आयु लगभग 15 वर्ष और एक माह थी इसलिए अपराध करते समय वह नाबालिग था।
इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने माना कि घटना के समय आरोपी वास्तव में नाबालिग था।
किशोर न्याय अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों का हवाला देते हुए, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किशोर होने का दावा किसी भी स्तर पर उठाया जा सकता है, यहां तक कि मुकदमे की समाप्ति के बाद या सजा पूरी होने के बाद भी यह दावा किया जा सकता है ।
अदालत ने पाया कि इस घटना में आरोपी की भूमिका अन्य सह-आरोपियों की भूमिका के समान थी।
अत: मामले में उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, अदालत ने माना कि चूंकि एक किशोर को तीन साल से अधिक समय तक सुधार गृह में नहीं रखा जा सकता है और न ही किसी नाबालिग को आजीवन कारावास जैसी सजा दी जा सकती है और चूंकि आरोपी पहले ही 13 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, इसलिए वह तत्काल रिहाई का हकदार है ।
भाषा सं दीप्ति नोमान
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