लेह, 11 अगस्त (भाषा) लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने मंगलवार को देश के पहले ‘ब्लैक नेक्ड क्रेन महोत्सव’ (काली गर्दन वाला सारस महोत्सव) का उद्घाटन किया।
यह महोत्सव विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले इस पक्षी के संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा, आर्थिक कल्याण और स्थानीय समुदायों की सतत आजीविका को बढ़ावा देने की पहल है।
लद्दाख राजभवन के प्रवक्ता ने बताया कि इस महोत्सव में भारत और विदेश के संरक्षण विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं तथा विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि इनमें संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल हैं। काली गर्दन वाले सारस की बड़ी आबादी वाले भूटान और नेपाल के विशेषज्ञ भी महोत्सव में भाग ले रहे हैं।
महोत्सव को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि ‘ब्लैक नेक्ड क्रेन’ का संरक्षण लद्दाख के आर्द्रभूमि क्षेत्रों, घास के मैदानों और ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि सो कर, हानले और अन्य प्रजनन क्षेत्रों जैसी आर्द्रभूमियां केवल वन्यजीवों का आवास नहीं हैं, बल्कि ये ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो जैव विविधता को बनाए रखने, जल प्रणालियों को नियंत्रित करने और पशुपालक समुदायों को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सक्सेना ने कहा, ‘इसलिए सारस के संरक्षण का मतलब उन पर्यावरणीय संसाधनों और आजीविका की रक्षा करना भी है, जो इन क्षेत्रों पर निर्भर हैं।’
उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यक्रमों का केवल लाभार्थी मानने के बजाय उन्हें संरक्षण के भागीदार, संरक्षक और अगुवा के रूप में पहचानना चाहिए। उन्होंने प्रभावी संरक्षण के लिए स्थानीय पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के साथ जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया।
उपराज्यपाल ने कहा, ‘काली गर्दन वाला सारस केवल एक पक्षी नहीं है। यह शांति का प्रतीक, हमारे ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्र का दूत और वन्यजीव संरक्षण तथा समुदायों के कल्याण के बीच एक सेतु है। हमारा लक्ष्य प्रकृति की रक्षा करते हुए उन लोगों के लिए सतत अवसर पैदा करना होना चाहिए, जिन्होंने पीढ़ियों से इन क्षेत्रों को सुरक्षित रखा है।’
उन्होंने जिम्मेदार पक्षी अवलोकन, प्रकृति पर्यटन, वन्यजीव फोटोग्राफी, स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इनके माध्यम से स्थानीय समुदायों के लिए टिकाऊ आर्थिक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
महोत्सव के तहत आयोजित सामुदायिक ज्ञान मंडल/सामुदायिक ज्ञान समूह को संरक्षण, संस्कृति और स्थानीय आजीविका को जोड़ने के उदाहरण के रूप में पेश किया गया।
दुनियाभर में काली गर्दन वाले सारस की संख्या करीब 16,000 है, जो भारत, भूटान, चीन और नेपाल में पाई जाती है। भारत में लद्दाख ही इस प्रजाति का एकमात्र प्रजनन क्षेत्र है, जिससे इसके संरक्षण के लिए केंद्र शासित प्रदेश का महत्व काफी बढ़ जाता है।
भाषा अमित दिलीप
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