नयी दिल्ली, 27 जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने कथित रूप से 10 किलोग्राम गांजा रखने के आरोप में स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज मामले में एक व्यक्ति को प्रक्रियात्मक खामियों और कई अन्य कमियों का हवाला देते हुए बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष एनडीपीएस अधिनियम की धारा 52ए के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन करने में विफल रहा। इस धारा के अनुसार, जब्त किए गए मादक पदार्थों की सूची तैयार करना, उनकी तस्वीरें लेना और सत्यापन के लिए उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र प्रताप सिंह, अमजद मंडल के खिलाफ दर्ज मामले की सुनवाई कर रहे थे। मंडल के विरुद्ध वसंत कुंज (उत्तर) थाने में एनडीपीएस अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष उन नियमों का पालन करने में भी विफल रहा, जिनके तहत किसी भी ‘‘गुप्त सूचना’’ की प्रति जब्ती करने वाले अधिकारी के वरिष्ठ को 72 घंटे के भीतर भेजना अनिवार्य होता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम जिले के स्वापक दल को 10 सितंबर, 2018 को ‘‘गुप्त सूचना’’ मिली थी कि आरोपी गांजा लेकर किशनगढ़ गांव की ओर जा रहा है। इसी सूचना के आधार पर मंडल को पकड़ा गया और उसके पास से 10 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया।
अभियोजन ने बताया कि बरामद नमूनों को जांच के लिए रोहिणी स्थित अपराध जांच विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजा गया था और जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया।
दो जून के अपने आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘एनडीपीएस अधिनियम से जुड़े मामलों में अभियोजन पक्ष के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि जांच एजेंसी ने अधिनियम के प्रावधानों का पालन करते हुए जांच की है।’’
अदालत ने कहा कि धारा 52ए एनडीपीएस अधिनियम में शामिल सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रावधानों में से एक है। इसे इस उद्देश्य से जोड़ा गया था कि जब्ती से लेकर अदालत में माल पेश किए जाने या प्रयोगशाला में जांच होने तक जब्त मादक पदार्थ के साथ छेड़छाड़, अदला-बदली या चोरी की किसी भी संभावना को समाप्त किया जा सके और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी एवं जवाबदेह बनी रहे।
अदालत ने कहा कि यह प्रावधान जब्ती करने वाले अधिकारी पर यह अनिवार्य दायित्व डालता है कि वह जब्त मादक पदार्थ की विस्तृत सूची तैयार करे और उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए आवेदन दे।
अदालत ने कहा, ‘‘कानून में यह भी प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित सूची, तस्वीरें या नमूनों की सूची को मुकदमे के दौरान प्राथमिक साक्ष्य माना जाएगा। यह प्रक्रिया वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है, क्योंकि यह उन मामलों में आरोपी के अधिकारों की रक्षा करती है, जहां कानून स्वयं आरोपी पर साक्ष्य का प्रतिकूल भार डालता है और कठोर दंड का प्रावधान करता है।’’
हालांकि, अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में धारा 52ए के पालन का कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया था।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला इसलिए और कमजोर हो जाता है, क्योंकि जांच में किसी भी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह को शामिल नहीं किया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘इसके अलावा तलाशी, जब्ती और नमूना लेने की पूरी प्रक्रिया की न तो वीडियोग्राफी की गई और न ही फोटोग्राफी। छापेमारी, आरोपी की गिरफ्तारी, नमूने लेने या सील करने की प्रक्रिया का भी कोई वीडियो रिकॉर्ड नहीं बनाया गया।’’
उसने कहा कि एक और गंभीर चूक एनडीपीएस अधिनियम की धारा 42 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन न करना है। इस धारा के अनुसार, प्राप्त गुप्त सूचना की प्रति जब्ती करने वाले अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी को 72 घंटे के भीतर भेजी जानी चाहिए थी।
अदालत ने कहा, ‘‘यह चूक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला उसी कथित गुप्त सूचना के आधार पर की गई बरामदगी पर आधारित है। धारा 42 का उल्लंघन तलाशी और जब्ती की वैधता की जड़ पर प्रहार करता है और अभियोजन पक्ष को कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक अनुमानों का लाभ भी नहीं मिल सकता।’’
अदालत ने आरोपी को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
भाषा गोला सुरेश
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