नयी दिल्ली, पांच फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत के खिलाफ उनकी पत्नी गीतांजलि जे अंगमो की याचिका पर सुनवाई नौ फरवरी के लिए स्थगित कर दी।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने मामले पर सुनवायी टाल दी।
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या इस बात की संभावना है कि वह जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी हिरासत पर पुनर्विचार कर सकती है।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि वांगचुक पिछले साल लेह में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 161 लोग घायल हुए।
केंद्र और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सीमावर्ती क्षेत्र में लोगों को उकसाने को लेकर हिरासत में लिया गया था।
वांगचुक की हिरासत को उचित ठहराते हुए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत उनकी हिरासत का आदेश देते समय सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया था।
केंद्र और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को बताया था कि वांगचुक ने नेपाल और बांग्लादेश की तरह विरोध प्रदर्शन के लिए ‘जेन जेड’ को उकसाने की कोशिश की थी।
‘जेन जेड’ शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है कि जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है।
मेहता ने पीठ को बताया था कि वांगचुक ने ‘अरब स्प्रिंग’ जैसे आंदोलन का भी जिक्र किया था। इस आंदोलन के कारण अरब जगत के कई देशों में सरकारें गिर गई थीं।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे ऐसे व्यक्तियों को हिरासत में ले सकें, जिसके ‘‘भारत की सुरक्षा के खिलाफ काम करने की आशंका हो। इस कानून के तहत अधिकतम हिरासत अवधि 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि इसे पहले भी समाप्त किया जा सकता है।
जोधपुर केंद्रीय जेल में बंद वांगचुक ने 29 जनवरी को, इन आरोपों से इनकार किया था कि उन्होंने ‘अरब स्प्रिंग’ की तरह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कोई बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि आलोचना करना और विरोध करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
अंगमो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस ने हिरासत प्राधिकारी को गुमराह करने के लिए ‘दूसरों से ली गई सामग्री’ और चुनिंदा वीडियो का सहारा लिया।
अंगमो का दावा है कि हिरासत गैर-कानूनी है और उनके बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करने वाली एक मनमानी कार्रवाई है।
वांगचुक को पिछले साल 26 सितंबर को हिरासत में लिया गया था। उससे दो दिन पहले, लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए थे, जिसमें केंद्र शासित प्रदेश में चार लोग मारे गए थे। सरकार ने उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था।
याचिका में कहा गया है कि यह पूरी तरह से ‘अविश्वसनीय’ है कि वांगचुक को तीन दशकों से अधिक समय से लद्दाख और पूरे भारत में जमीनी स्तर पर शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान के लिए राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के बाद अचानक निशाना बनाया जाए।
अंगमो ने कहा कि पिछले साल 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को किसी भी तरह से वांगचुक के कामों या बयानों से नहीं जोड़ा जा सकता।
अंगमो ने कहा कि वांगचुक ने खुद अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिए हिंसा की निंदा की और साफ तौर पर कहा कि हिंसा लद्दाख की ‘तपस्या’ और पांच साल की शांतिपूर्ण कोशिश को नाकाम कर देगी और यह उनकी ज़िंदगी का सबसे दुखद दिन था।
भाषा अमित नरेश
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