नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने भारतीय फार्मेसी परिषद (पीसीआई) के कामकाज पर सोमवार को गंभीर चिंता जताई और फार्मेसी कॉलेज को हर साल मंजूरी दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा नियामकीय व्यवस्था छात्रों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रही है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने पूछा कि केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित सुधारों के बावजूद “पुरानी” व्यवस्था क्यों जारी है।
पीठ पीसीआई की ओर से फार्मेसी कॉलेज के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
पीठ ने कहा कि फार्मेसी संस्थानों के लिए मंजूरी प्रक्रिया में अनिश्चितता छात्रों के लिए ठीक नहीं है। उसने कहा कि गैरजरूरी कारक फार्मेसी शिक्षा की गुणवत्ता पर बुरा असर डाल रहे हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने संस्थानों के पास जरूरी बुनियादी ढांचा होने के बावजूद उन्हें हर साल मंजूरी दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा, “कई बार मशीनें और उपकरण भी बेहतर गुणवत्ता के होते हैं… आप बी फार्मा, एम फार्मा या कॉलेज की ओर से संचालित किसी अन्य डिप्लोमा कार्यक्रम के लिए ऐसा कर सकते हैं। लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि बी फार्मा पाठ्यक्रम के लिए एक साल का लाइसेंस मिलेगा और फिर अगले साल के लिए फिर से लाइसेंस लेना होगा।”
सॉलिसिटर जनरल ने माना कि मौजूदा व्यवस्था से छात्रों के लिए अनिश्चितता पैदा हो रही है।
मेहता ने पीठ से कहा, “कॉलेज के लिहाज से देखें तो छात्र के लिए स्थिति का अंदाजा लगाना बिल्कुल मुश्किल हो जाता है। अनिश्चितता वांछनीय नहीं है। लेकिन मुझे उनसे बात करने दीजिए और फिर मैं आपको बताता हूं। मैं बात समझ गया हूं।”
उन्होंने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार मौजूदा व्यवस्था की जगह एक नया विधायी ढांचा तैयार करने पर काम कर रही है।
मेहता ने कहा, “विधेयक लंबित है। मैं स्वतः संज्ञान लेकर कोई बयान नहीं दे सकता। हो सकता है कि यह इसी सत्र में आ जाए।”
उन्होंने कहा, “यह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की तर्ज पर होगा। इसे राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग कहा जाएगा।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत की मुख्य चिंता फार्मेसी शिक्षा को नियंत्रित करने वाले नियामकीय ढांचे को लेकर है।
उन्होंने कहा, “हमारी चिंता बस इतनी ही है। नये कानून के तहत संसद कुछ भी तय कर सकती है। हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “अगर वे कॉलेज नहीं चलाना चाहते, तो उन्हें बंद कर दें। हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आप कोई नया अवतार या नया कानूनी ढांचा ला सकते हैं, तो यह अच्छी बात है।”
मेहता ने कहा कि यह विधेयक संसद में पेश किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, “लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधियों के अपने विचार और प्राथमिकताएं होती हैं। मैं यह बात बहुत विनम्रता से कह रहा हूं, क्योंकि मौजूदा हालात में इससे बहुत सारी दिक्कतें पैदा हो रही हैं।”
पीठ ने कहा कि संसद सत्र चल रहा है, जिसके मद्देनजर मामले पर आगे की सुनवाई कुछ समय के लिए टाली जा रही है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “हम इस मामले पर दो हफ्ते बाद विचार कर सकते हैं। अभी संसद का सत्र चल रहा है। या फिर हम 20 अगस्त के बाद इस पर सुनवाई कर सकते हैं। देखते हैं।”
भाषा पारुल दिलीप
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