अदालत का विपक्ष के नेता की नियुक्ति पर बंगाल विधानसभा अध्यक्ष के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार
अदालत का विपक्ष के नेता की नियुक्ति पर बंगाल विधानसभा अध्यक्ष के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार
कोलकाता, 18 जून (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस के उस फैसले पर कोई अंतरिम आदेश देने से बृहस्पतिवार को इनकार कर दिया जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट के विधायक रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त किया गया था।
तृणमूल विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने विपक्ष के नेता पद के लिए उनकी दावेदारी खारिज किए जाने और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनर्जी को इस पद पर नियुक्त किए जाने को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया था।
न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार करते हुए मामले को अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
राज्य विधानसभा का बजट सत्र बृहस्पतिवार को शुरू हुआ और इसकी कार्यवाही 25 जून को समाप्त होनी है। ऐसे में हस्तक्षेप से अदालत के इनकार का प्रभावी अर्थ यह है कि विधानसभा अध्यक्ष की मंजूरी से नियुक्त बागी तृणमूल गुट के पदाधिकारी फिलहाल अपने-अपने पदों पर काम करते रहेंगे।
विधानसभा अध्यक्ष ने रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता, जावेद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक नियुक्त करने की मंजूरी दी थी।
अदालत ने याचिका में प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति राव ने कहा कि याचिकाकर्ता को इसके बाद दो सप्ताह के भीतर उन हलफनामों पर जवाब दाखिल करने का अवसर मिलेगा।
बागी गुट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के कुल 80 विधायकों में से 58 का समर्थन होने का दावा किया है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट से जुड़े चट्टोपाध्याय ने इस आधार पर अंतरिम आदेश दिए जाने का अनुरोध किया था कि 18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा का पहला सत्र बृहस्पतिवार से शुरू होना था।
अदालत ने पूर्व में सुनवाई के दौरान विपक्ष के नेता और अन्य पदाधिकारियों के लिए एक ही राजनीतिक दल की ओर से दो परस्पर विरोधी प्रस्ताव मिलने पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे।
पीठ ने टिप्पणी की थी कि जब विधानसभा अध्यक्ष को दो प्रस्ताव मिले थे तो वह ‘‘अपने कक्ष में बैठकर, सदन बुलाए बिना और दोनों गुटों से बहुमत साबित कराए बिना खुद कैसे तय कर सकते हैं कि कौन सही है और कौन गलत?’’
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि ऐसी परिस्थितियों में विधानसभा अध्यक्ष का क्या कर्तव्य है? क्या वह दोनों प्रस्तावों में से किसी एक पर स्वत: फैसला कर सकते हैं या उन्हें दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देना चाहिए?
न्यायाधीश ने अतिरिक्त महाधिवक्ता और विधानसभा अध्यक्ष के वकील बिल्वदल भट्टाचार्य से यह भी पूछा था कि क्या अध्यक्ष पदाधिकारियों के नामों का पहला प्रस्ताव पार्टी की ओर से भेजे जाने के बाद बागी विधायकों की आपत्ति का इंतजार कर रहे थे।
तृणमूल विधायक संदीपन साहा ने अदालत के रुख को असंतुष्ट विधायकों की ‘‘नैतिक जीत’’ करार दिया।
साहा, विपक्ष के नेता पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम का समर्थन करने वाले तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के पत्र के खिलाफ शिकायत करने वाले दो नेताओं में शामिल हैं।
साहा ने विधानसभा परिसर में संवाददाताओं से कहा, ‘‘यह हमारी नैतिक जीत है क्योंकि 58 से अधिक विधायकों ने विपक्ष के नेता के रूप में रिताब्रता बनर्जी का समर्थन करने वाले पत्रों पर हस्ताक्षर कर मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुसार उन्हें विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा था। अब हमारा संख्या बल शुरुआती आंकड़े से काफी अधिक हो गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हम जिस उद्देश्य से मुख्य विपक्षी गुट के रूप में एकजुट हुए हैं, उसे लेकर आगे बढ़ेंगे।’’
भाषा सिम्मी नरेश
नरेश

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