नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को अवमानना नोटिस का जवाब नहीं देने पर फटकार लगाई। यह नोटिस आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के मरीजों को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने के संबंध में जारी किया गया था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने अस्पताल से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अस्पताल ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि उसे बैठक में भाग लेने के लिए कोई नोटिस नहीं दिया गया था।
पीठ ने कहा, ‘‘यह बयान दो अप्रैल, 2026 की कार्यालय रिपोर्ट के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से दर्ज है कि नोटिस तामील किया गया था। इसलिए हलफनामे में दिया गया यह बयान प्रथम दृष्टया झूठा है। अत: हम उक्त प्रतिवादी के चिकित्सा अधीक्षक के माध्यम से उसके खिलाफ औपचारिक अवमानना कार्यवाही शुरू करते हैं।’’
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र एवं वरिष्ठ अधिवक्ता संजय जैन ने शीर्ष अदालत को बताया कि 52 में से केवल 12 अस्पतालों ने बैठक में भाग लिया।
उन्होंने बताया कि अदालत के निर्देश के अनुसार संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) दाखिल कर दी गई है।
पीठ ने कहा, ‘‘बताया गया है कि परामर्श प्रक्रिया में केवल 12 अस्पतालों ने भाग लिया। कई अस्पतालों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा है कि वे संशोधित एसओपी पर अपनी प्रतिक्रियाएं और सुझाव दाखिल करना चाहते हैं।’’
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर के लिए सूचीबद्ध की।
शीर्ष अदालत वर्ष 2018 के अपने फैसले से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उस फैसले में कहा गया था कि रियायती दरों पर जमीन हासिल करने वाले अस्पतालों को ईडब्ल्यूएस के मरीजों का मुफ्त इलाज करना होगा। इसके तहत अस्पतालों के अंत:रोगी विभाग (आईपीडी) में 10 प्रतिशत और बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में 25 प्रतिशत मरीजों को मुफ्त उपचार उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
भाषा शफीक नरेश
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