नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एनएसयूआई अध्यक्ष की उस याचिका पर केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय से जवाब मांगा, जिसमें संस्थान के सभी कॉलेजों में छात्रावास सुविधा की मांग की गई थी।
इस जनहित याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों के लिए किफायती और पर्याप्त संस्थागत छात्रावास सुविधा की ‘‘लंबे समय से चली आ रही कमी’’ का मुद्दा उठाया गया।
नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के अध्यक्ष विनोद जाखड़ द्वारा यह याचिका 6 सितंबर को सत्य निकेतन में एक इमारत गिरने की घटना के बाद दायर की गई थी। इस इमारत का इस्तेमाल छात्रों के निजी ‘पेइंग गेस्ट’ (पीजी) के तौर पर किया जा रहा था।
हादसे में सात लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया और उनसे याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा।
अदालत ने याचिका पर सुनवाई के लिए 25 सितंबर की तारीख तय की और इसे इमारत गिरने की घटना से जुड़े एक और मामले के साथ जोड़ दिया।
जनहित याचिका को एक बहुत गंभीर मुद्दा मानते हुए, अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि उन्होंने बिना किसी वजह के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को याचिका में पक्ष क्यों बनाया और उन्हें इसे हटाने के लिए कहा।
याचिका में कहा गया है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के 104 साल से ज्यादा समय बीतने और छात्रों की संख्या व भौगोलिक विस्तार में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, रहन-सहन की सुविधा उस अनुपात में विकसित नहीं हुई है।
इसमें कहा गया है कि बड़ी संख्या में कॉलेजों में कोई छात्रावास सुविधा नहीं है, जबकि जिन कॉलेजों में छात्रावास हैं, वहां सीटों की संख्या असल जरूरत के मुकाबले बहुत कम है।
याचिका में कहा गया है कि इस कमी का नतीजा यह है कि हजारों छात्रों, खासकर दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आने वाले छात्रों को अपने कॉलेजों के आस-पास निजी पीजी, निजी छात्रावासों और किराए के कमरों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
इसमें कहा गया है कि सत्य निकेतन की घटना को सिर्फ एक इमारत, एक इलाके या विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर से जुड़ी घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह शहर भर में डीयू के कॉलेजों के आस-पास निजी तौर पर चलाए जा रहे छात्रावासों या पीजी में रहने वाले हजारों छात्रों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़ा एक बड़ा सवाल उठाती है।
भाषा वैभव पवनेश
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