अदालत ने वीडियो संबंधी याचिका पर केजरीवाल से जवाब मांगा, वीडियो क्लिप हटाने को कहा

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अदालत ने वीडियो संबंधी याचिका पर केजरीवाल से जवाब मांगा, वीडियो क्लिप हटाने को कहा

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  • Publish Date - April 23, 2026 / 05:52 PM IST,
    Updated On - April 23, 2026 / 05:52 PM IST

नयी दिल्ली, 23 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह तथा अन्य से एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा।

जनहित याचिका में शराब नीति मामले में सुनवाई से न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने का अनुरोध करने वाली पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल की याचिका पर अदालती कार्यवाही के वीडियो अपलोड करने और साझा करने के आरोप में उनके खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई का आग्रह किया गया है।

न्यायमूर्ति वी कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी एस अरोड़ा की पीठ ने अधिवक्ता वैभव सिंह की याचिका पर संबंधित लोगों को नोटिस जारी किया और सोशल मीडिया मंचों को 13 अप्रैल की सुनवाई के वीडियो हटाने का निर्देश दिया क्योंकि उच्च न्यायालय के नियमों के तहत अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और साझा करना प्रतिबंधित है।

मेटा मंचों और गूगल के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा याचिका में चिह्नित किए गए लिंक हटा दिए गए हैं।

यह उल्लेख करते हुए कि कथित तौर पर 13 अप्रैल की कार्यवाही दिखाने वाले कुछ वीडियो ‘एक्स’ पर उपलब्ध हैं, अदालत ने निर्देश दिया, ‘‘यदि ऐसा है, तो प्रतिवादी संख्या 4 (एक्स) नोटिस प्राप्त होने पर तुरंत उन लिंक को हटाए।’’

अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि यदि उसे कार्यवाही की कोई अन्य वीडियो क्लिप मिलती हैं तो वह सोशल मीडिया मंचों के वकील से संपर्क कर सकता है, जिन्हें बाद में उनके द्वारा हटा दिया जाएगा।

इसने कहा, ‘‘हम प्रतिवादी संख्या 4 और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हैं। हलफनामा चार सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए।’’

अन्य प्रतिवादियों में आप नेता संजीव झा, मुकेश अहलावत, जरनैल सिंह और पत्रकार रवीश कुमार शामिल हैं।

मामले की सुनवाई छह जुलाई को निर्धारित करते हुए, अदालत ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी नोटिस जारी किया और मामले में उपस्थिति दर्ज कराने को कहा।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के नियमों के तहत अदालती सुनवाई की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, इसे अपलोड करना और इसका प्रकाशन निषिद्ध है। इसने सोशल मीडिया मंचों से पूछा कि क्या वे अपलोड होने के बाद ऐसी सामग्री को हटाना सुनिश्चित कर सकते हैं।

मेटा मंचों की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि एक मध्यस्थ के रूप में, यह न तो ‘‘सुपर सेंसर’’ के रूप में कार्य करता है और न ही इसके पास विशिष्ट सामग्री की उपस्थिति की सक्रिय रूप से निगरानी करने की तकनीक है, बल्कि यह कानून के अनुसार किसी मुद्दे के बढ़ने पर कार्रवाई करता है।

मेटा के वकील ने कहा, ‘‘जैसे ही हमें पता चलता है, हम इसे हटा देते हैं। जैसे ही हमें पत्र मिला (इस मामले में उच्च न्यायालय प्रशासन से), हमने इसे हटा दिया।’’

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया मंच के खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई शुरू करने का कोई मामला नहीं बनता।

अदालत ने सोशल मीडिया मंचों से यह भी पूछा कि क्या वे बता सकते हैं कि विवादित वीडियो अपलोड करने वाला पहला व्यक्ति कौन था।

मेटा के वकील ने कहा कि चूंकि अपलोड करने वाले खातों की पहचान हो चुकी है, इसलिए वे ‘सब्सक्राइबर’ की जानकारी दे सकते हैं।

बीस अप्रैल को न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने शराब नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि बिना किसी ठोस सबूत के किसी वादी को न्यायाधीश का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और न्यायाधीश किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को सुनवाई से अलग नहीं कर सकते।

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश