न्यायालय पांच साल के बजाय चार साल के एलएलबी पाठ्यक्रम संबंधी याचिका पर सुनवाई करेगा

न्यायालय पांच साल के बजाय चार साल के एलएलबी पाठ्यक्रम संबंधी याचिका पर सुनवाई करेगा

न्यायालय पांच साल के बजाय चार साल के एलएलबी पाठ्यक्रम संबंधी याचिका पर सुनवाई करेगा
Modified Date: March 16, 2026 / 03:29 pm IST
Published Date: March 16, 2026 3:29 pm IST

नयी दिल्ली, 16 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय कानूनी शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने और कक्षा 12वीं के बाद पांच-वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम के बजाय चार-वर्षीय पाठ्यक्रम के लिए एक विधि शिक्षा आयोग की स्थापना के संबंध में दायर याचिका पर अप्रैल में सुनवाई करेगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अधिवक्ता एवं जनहित याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत दलीलों पर गौर किया, जिन्होंने भारत में विधि अध्ययन के पाठ्यक्रम की समीक्षा और निर्धारण के लिए प्रख्यात न्यायविदों के एक आयोग के गठन का अनुरोध किया।

उपाध्याय ने वकील अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में कहा कि कई देशों में 12वीं कक्षा के बाद एलएलबी का पाठ्यक्रम चार साल का होता है, जबकि यहां यह पांच साल का है और उसमें व्यावहारिक ज्ञान की कमी है।

उपाध्याय ने कहा कि आयोग में प्रमुख न्यायविदों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए, जो विधिक शिक्षा के मौजूदा ढांचे की समीक्षा कर सकें और अधिक प्रभावी पाठ्यक्रम तैयार कर सकें।

उन्होंने दलील दी कि वर्तमान पांच-वर्षीय एकीकृत विधि पाठ्यक्रम सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने में विफल रहा है और इसमें ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कानूनी शिक्षा देना एक मुद्दा है और कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता दूसरा मुद्दा है, लेकिन यह जनहित याचिका अच्छी है। हालांकि, प्रतिभाशाली लोग आ रहे हैं…एक आपत्ति व्यावहारिक शिक्षा को लेकर हो सकती है। पांच-वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू करने वाला संस्थान बेंगलुरु स्थित एनएसएलआईयू (नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी) नहीं, बल्कि रोहतक (हरियाणा) का एमडी (महर्षि दयानंद) विश्वविद्यालय था।’’

अपने अनुभव साझा करते हुए, प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘रोहतक से पहला बैच 1982 या 1983 का था। जब मैं वहां से (पढ़कर) निकला था, तब तक यह तीसरा बैच हो चुका था।’’

उन्होंने कहा, “लेकिन, न्यायपालिका ही एकमात्र हितधारक नहीं है। हम अपने विचार थोप नहीं सकते। शिक्षाविद, न्यायविद, बार एसोसिएशन, सामाजिक और नीति शोधकर्ता आदि भी मौजूद हैं…उन्हें भी इस पर विचार-विमर्श करना चाहिए। इसे अप्रैल 2026 में सूचीबद्ध किया जाए।’’

भाषा आशीष सुरेश

सुरेश


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