नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने यूपीआई से लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव का बृहस्पतिवार को विरोध करते हुए इसे ‘जनता के भरोसे से विश्वासघात’ करार दिया और इस संबंध में प्रस्तावित विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की।
पार्टी पोलित ब्यूरो ने एक बयान में कहा कि मोदी सरकार ने ‘‘डिजिटल भुगतान और यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) को एक मुफ्त सार्वजनिक सुविधा के तौर पर आक्रमक तरीके से बढ़ावा दिया है’’ और प्रधानमंत्री ने ‘‘नागरिकों, छोटे व्यापारियों और कारोबारियों से बार-बार नकदी का इस्तेमाल छोड़कर डिजिटल लेन-देन अपनाने की अपील की है’’।
माकपा ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री स्वयं यूपीआई को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों में दिखे हैं, जिनमें एक निजी भुगतान कंपनी का विज्ञापन भी शामिल है। असल में, इस प्रचार को नोटबंदी के बचाव में एक दलील के तौर पर भी पेश किया गया था।’’
वाम दल ने कहा कि लोगों को भुगतान के पसंदीदा तरीके के तौर पर यूपीआई अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के बाद, सरकार अब उसी सार्वजनिक अवसंरचना से कमाई करने की कोशिश कर रही है।
बयान में कहा गया, ‘‘…यह जनता के भरोसे को तोड़ने जैसा है, क्योंकि सरकार ने हमेशा यही कहा था कि यूपीआई मुफ़्त रहेगा।’’
माकपा ने कहा कि इस कदम को ‘‘अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता’’ और आरोप लगाया कि पिछले एक दशक में लोगों पर ‘‘बैंकिंग से जुड़े कई तरह के शुल्क लगातार बढ़ाए गए हैं’’।
पार्टी ने ‘‘प्रस्तावित कानून को तुरंत वापस लेने’’ की मांग करते हुए कहा कि ‘‘यूपीआई एक ऐसा डिजिटल भुगतान प्रणाली बना रहना चाहिए जो मुफ़्त, सबके लिए उपलब्ध और सार्वजनिक रूप से जवाबदेह हो।’’
लोकसभा ने बृहस्पतिवार को विपक्ष के हंगामे के बीच ‘कराधान एवं अन्य विधियां संशोधन विधेयक, 2026’ को चर्चा के बिना पारित कर दिया। यह केंद्र को ऐसे इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम को अधिसूचित करने का अधिकार देता है, जिन पर बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता शुल्क लगा सकते हैं।
भाषा धीरज पवनेश
पवनेश