प्रदर्शन के लिए भीड़ अब सोशल मीडिया के जरिये जुटाई जा रही; पुलिस कार्यशैली बदले :पूर्व डीजीपी

प्रदर्शन के लिए भीड़ अब सोशल मीडिया के जरिये जुटाई जा रही; पुलिस कार्यशैली बदले :पूर्व डीजीपी

प्रदर्शन के लिए भीड़ अब सोशल मीडिया के जरिये जुटाई जा रही; पुलिस कार्यशैली बदले :पूर्व डीजीपी
Modified Date: July 31, 2026 / 08:42 pm IST
Published Date: July 31, 2026 8:42 pm IST

चंडीगढ़, 31 जुलाई (भाषा) हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओ.पी. सिंह ने शुक्रवार को कहा कि भारत में विरोध-प्रदर्शन करने वाली भीड़ अब सोशल मीडिया के जरिये जुटाई जा रही है और ये प्रदर्शन महज कुछ समय के लिए होने वाली हलचल के बजाय स्थायी राजनीतिक शक्ति का रूप ले चुके हैं। उन्होंने पुलिस प्रमुखों से अपने काम करने के तरीके बदलने का आग्रह किया।

पिछले साल दिसंबर में, 33 वर्ष की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए सिंह ने एक खुले पत्र में लिखा कि हाल में ‘‘राष्ट्रीय राजधानी में जुटी भीड़ ऑनलाइन (प्लेटफॉर्म के जरिये) एकत्र हुई, डटी रही, एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे का कारण बनी, सरकार से बातचीत की और अब अपने लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है।’’

उन्होंने कहा कि इसे राजनीतिक घटनाक्रम के बजाय, सामने आई नयी वास्तविकता के रूप में देखा जाना चाहिए।

सिंह का यह बयान ऐसे समय आया है, जब युवा नेतृत्व वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) ने शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा अपनी अन्य मांगें स्वीकार किए जाने के बाद, दिल्ली के जंतर-मंतर पर 36 दिन से जारी आंदोलन पिछले हफ्ते शनिवार को समाप्त कर दिया।

व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान के रूप में शुरू हुई कॉजपा ने 20 जून से धरना दिया था। संगठन ने नीट-यूजी 2026 प्रश्नपत्र लीक, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ‘ऑन-स्क्रीन’ मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और लोक परीक्षाओं में व्यापक सुधार की मांग की थी। इस आंदोलन को देशभर के हजारों छात्रों और प्रमुख विपक्षी दलों का समर्थन मिला था। प्रदर्शनकारियों के 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और उनपर लाठीचार्ज किया था।

सिंह ने लिखा कि वर्तमान में, भारत में जो लोग भीड़ जुटा सकते हैं, वे अक्सर ऐसे लोग होते हैं जो महत्वाकांक्षी हैं और उनके (सोशल मीडिया पर) काफी संख्या में ‘फॉलोअर’ हैं। वे सोशल मीडिया के जरिये भीड़ जुटाते हैं तथा उनकी रणनीति का अहम हिस्सा वीडियो रिकॉर्ड करना है।

पूर्व डीजीपी ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों की प्रकृति बदल चुकी है, लेकिन ‘पुलिसिंग’ के तौर-तरीके उस अनुपात में नहीं बदले हैं।

उन्होंने लिखा कि युवतियों ने पीढ़ियों से भारत में विरोध-प्रदर्शन में भाग लिया है लेकिन बदलाव यह नहीं है, बल्कि उनके हाथ में मौजूद कैमरा और उसके इस्तेमाल की अच्छी समझ है। उनके अनुसार, प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मी के बेहद करीब जाकर वीडियो बनाते हैं क्योंकि ‘‘फुटेज ही उनका असल मकसद होता है।’’

उन्होंने कहा कि ‘इन्फ्लुएंसर’ वीडियो क्लिप तैयार करने में लगे होते हैं, जबकि सेलिब्रिटी ‘‘एक घंटे के लिए आते हैं और उनकी तस्वीरें खींची जाती हैं।’’

सिंह ने कहा कि ऐसी भीड़ का कोई औपचारिक नेतृत्व नहीं होता — ‘‘न कोई यूनियन, न कोई पार्टी कार्यालय, न कोई मार्शल, और न ही ऐसा कोई व्यक्ति जिसे ज़िलाधिकारी रात में फ़ोन कर सके।’’ ऐसे में जमीन पर मौजूद पुलिसकर्मियों को हिंसा पर उतारू कुछ लोगों को उन बहुत से लोगों से अलग-थलग करना पड़ता है जो हिंसा नहीं करना चाहते थे, ‘‘कुछ ही सेकंड में और कैमरे के सामने।’’

उन्होंने लिखा, ‘‘जो पुलिसकर्मी अपना काम सही ढंग से करता है, उसका कोई वीडियो नहीं बनता, लेकिन जो गलती करता है, वही वीडियो सब देखते हैं।’’ उन्होंने कहा कि जुलाई में दिल्ली में एक ही दिन में 100 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, लेकिन ऐसी घटनाओं के वीडियो बहुत कम सामने आए।

सिंह ने लिखा, ‘‘(पुलिस का) जन संपर्क प्रकोष्ठ, जो किसी ब्रीफिंग में शामिल नहीं होता और न ही कोई फैसला लेता है, वह कुछ ऐसा बयान तैयार करता है जिसका बचाव किया जा सके। इसे मंजूरी के लिए ऊपर (उच्च पदस्थ अधिकारियों को) भेजा जाता है और काफी देरी से जारी किया जाता है… इसमें किसी एक की गलती नहीं होती और न ही यह किसी के सवाल का जवाब देता है।’’

उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक पुलिस प्रमुख अपनी भाषा में लगभग 300 शब्दों का एक संदेश अपने बल के नाम जारी करे, जिसमें सड़क पर बदली परिस्थितियों, पुलिसकर्मियों से अपेक्षाओं, उचित कार्रवाई पर मिलने वाले समर्थन और सीमा लांघने पर होने वाली कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख हो। उसी समय इसे सार्वजनिक भी किया जाए।

सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में भी यही तरीका अपनाया था। उन्होंने लिखा, ‘‘मैंने एक कठिन दौर से गुजर रहे राज्य की जिम्मेदारी संभालते समय खुलकर संवाद शुरू किया था और एक बेहतर स्थिति छोड़ी। इसलिए मैं यह तरीका दूसरों को भी अपनाने की सलाह दे रहा हूं।’’

भाषा सुभाष नरेश

नरेश


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