भुवनेश्वर, छह सितंबर (भाषा) पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत मतदाताओं के नाम हटाने को ‘‘तर्कहीन, अनुचित, मनमाना और शरारतपूर्ण’’ करार दिया।
उन्होंने कहा कि ‘‘मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाना एक घोटाला है’’ और दावा किया कि ‘‘एक बनावटी प्रक्रिया के जरिए लगभग 15 प्रतिशत आबादी को ही सूची से हटा दिया गया।’’
उन्होंने यहां पत्रकारों से कहा, ‘‘यह षडयंत्रपूर्ण और शरारतपूर्ण है।’’
कुरैशी ने हैरानी जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने ‘‘बहुत नरम रुख अपनाया है, जिससे यह अत्याचार जारी रह सका है, जिसमें देश भर में लगभग 13-14 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए गए।’’
उन्होंने जोर देकर कहा कि वैध मतदाताओं के नाम हटाना ‘‘किसी भी कारण स्वीकार्य नहीं है।’’
कुरैशी ने कहा, ‘‘जिनके नाम हटाये गए हैं उनमें से करीब 90 प्रतिशत निश्चित रूप से (वोट देने के) पात्र हैं। क्या सभी लोग दूसरी जगह चले गए हैं?’’
उन्होंने सवाल किया और कहा कि ‘‘अगर कोई मतदाता दूसरी जगह चला गया है, तो उनके नाम नयी जगह पर जोड़े जाने चाहिए थे।’’
कुरैशी ने कहा, ‘‘हैरानी की बात है कि सिर्फ नाम हटाए जा रहे हैं। क्या कोई बाहर से आकर यहां नहीं बस रहा… क्या सिर्फ लोग यहां से बाहर जा रहे हैं? यह पूरी तरह से बेतुका, अनुचित, मनमाना और शरारतपूर्ण है।’’
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ने कहा कि भारत के हर नागरिक को मतदाता बनने का मौलिक अधिकार है और अगर किसी भी वजह या बहाने से एक भी योग्य व्यक्ति का नाम सूची से हटाया जाता है, तो यह असंवैधानिक और गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि इसके लिए किसी न किसी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इसके लिए आपराधिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। ‘‘आप सिर्फ प्रक्रियागत या प्रशासनिक कारणों से, या किसी ऐसे कारण से जो मेरी समझ से बाहर है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकते।’’
निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 2002 की मतदाता सूची की शुचिता पर सवाल उठाते हुए, पूर्व सीईसी ने कहा, ‘‘क्या यह बाइबिल से आई है? क्या 2002 की मतदाता सूची में कोई गलती नहीं है? सूची में मेरे अपने पिता के नाम की वर्तनी में अशुद्धि थी। इसलिए, इसका इस्तेमाल सिर्फ संदर्भ के तौर पर ही किया जा सकता है।’’
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